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दुर्भाग्यवष मैं एक अछूत हिन्दू जन्मा था, परन्तु मैं वैसा
मरूंगा नहीं
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने दस वर्ष के अनथक प्रयास के पश्चात राजनीतिक तथा सामाजिक स्थिति की समीक्षा हेतु दलित वर्ग का येवला (जिला नासिक) में रविवार, 13 अक्तूबर 1935 को एक अधिवेशन बुलाने का निर्णय लिया।
शनिवार, 12 अक्तूबर, 1935 को डॉ. अम्बेडकर के नासिक आगमन पर उनका खूब जोष से स्वागत हुआ तथा उन्हें एक बड़े जुलूस में नासिक शहर ले जाया गया। उन्होंने नासिक शहर में वाचानालय का उद्घाटन किया।
इस अवसर पर उन्होंने कहा ‘‘आप आत्म सहायता में विश्वास करते हो। आपको अपने पैरों पर खड़े होकर अपनी उन्नति के लिए संघर्ष करना है। अगर अचानक मेरे साथ कोई अनहोनी हो जाए या मैं ना रहूं तो मेरे बाद भी आपको संघर्ष जारी रखना होगा’’।
रविवार पेठ की हीरालाल गली में रात्रि को 9 बजे एक अर्न्तजातीय भोज का भी आयोजन किया गया, जिसमें केवल एक कांग्रेसी श्री देश पाण्डे ने भाग लिया।
रविवार 13 अक्तूबर 1935 को डॉ. अम्बेडकर विंचुर गये और वहां उनका स्वागत हुआ। इसी भांति जब वे येवला जा रहे थे तो रास्ते भर गांव वालों ने उनका स्वागत किया। येवला नगरपालिका ने सुबह डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को सम्मान पत्र भेंट किया। सम्मान पत्र का उत्तर देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा-
‘‘अब हम इस निष्कर्ष पर पंहुचे हैं कि छूतों की मनोवृति में कोई बदलाव नहीं आया है और अछूतां का अधिकारों के लिए निरन्तर लड़ाई के बाद भी छूतों के व्यवहार में कोई स्नेह वाली बात नहीं है। इस कारण हमने हिन्दुओं से अलग रहने का, स्वालंबी होने तथा संघर्ष से कामयाब होने का निर्णय लिया है।’’ ख्1,
13 अक्तूबर 1935 को 10 बजे रात्रि येवला के अधिवेशन में विभिन्न विचाराधारा वाले लगभग 10,000 अछूतों ने उपस्थिति जताई। इस अधिवेशन में हैदराबाद राज्य और मध्य प्रांत के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। स्वागत समिति के अध्यक्ष अमृत राव
1 खैरमोड़, पुस्तक 6, पृष्ठ 84-85