92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
रणखम्बे ने दलित वर्ग के महान प्रदर्शन तथा भविष्य निर्माण के प्रति रुचि दिखाने पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘पतन की ओर अग्रसर हिन्दूवाद को ब्राह्मणवाद कहना उचित था क्योंकि यह श्रेणीबद्ध समाज के नाम पर केवल ब्राह्मण उच्चता को प्रतिष्ठित और लाभान्वित करता है’’।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अत्यंत संवेदनशील तथा भावना पूर्ण विचार प्रकट करते लगभग 1 ½ ) घंटे दलितों की अति गंभीर वित्तीय, सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में चल रहे पिछपड़ेन का वर्णन किया और उनके महान बलिदानों का स्मरण कराया जो दलितों ने हिन्दुत्व के तत्वावधान में हिन्दू समुदाय के ही लोगों से अपने लिए न्यूनतम मानव अधिकार हिन्दु बने रहते मांगे थे। उन्होंने कालाराम मंदिर प्रवेश आन्दोलन का उल्लेख किया जहां पिछले पांच वर्षों में दलित वर्ग के लोगां से अमानुषिक व्यवहार किया गया। उन्होंने आगे बताया कि कैसे उनके न्यूनतम प्रारम्भिक अधिकार और हिन्दू समाज में समानता में की बात व संघर्ष, पूर्ण रूप से ठुकरा दिए गये। बाबा साहेब ने बताया कि बड़े दुःख से उन्हें यह यथार्थ समझ में आया कि हमें अपना ध्येय प्राप्त करने के लिए लगाया समय, तथा धन और प्रयास सब व्यर्थ गए।
उन्होंने कहा कि मेरा सुझाव है कि समस्या के समाधान के लिए अंतिम निर्णय लेने का समय आ गया है। वे अयोग्यताएं जो हम झेल रहे हैं और तिरस्कार जो हम भोगते हैं केवल हमारे हिन्दू होने के ही कारण हैं। उन्होंने श्रोताओं से पूछा कि क्या यह हमारे लिए बेहतर न होगा कि हम यह धर्म ही त्याग दें और किसी दूसरी धार्मिक आस्था को अपना लें, जहाँ हमें समता का स्तर, सुरक्षामय स्थिति और न्यायोचित अधिकार मिलते हों।
गहन गंभीर आगज में उन्होंने श्रोताओं को हिन्दुत्व से सब रिश्ते नाते तोड़ने के बाद राहत तलाशने और आत्म सम्मान प्राप्त करने जैसी क्रियाऐं किसी दूसरे धर्म में शरणागत होने पर प्राप्ति के लिए प्रोत्साहित किया। परन्तु उन्होंने चेतावनी दी कि उन्हें नई धार्मिक आस्था के चुनाव में सावधानी बरतनी होगी कि व्यवहार में समता, प्रतिष्ठा और अवसर प्रदान करने में कोई भी शर्तें लागू न हों।
डॉ. अम्बेडकर ने निजी निर्णय के विषय में अवगत कराते हुए कहा कि दुर्भाग्यवश उनका जन्म एक अछूत हिन्दू के यहां हुआ था। इसको रोकना उनके वश की बात नहीं थी परन्तु उन्हें जन्म से तुच्छ और अपमानजनक अवस्था में जीना स्वीकार नहीं है और ऐसा करना उनके वश में है। उन्होंने गरजना की’’ ‘‘मैं पूरी गम्भीरता से आप सबको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं हिन्दू मंरूगा नहीं’’। अन्त में उन्होंने अपने लोगों से कालाराम मंदिर सत्याग्रह रोकने को कहा क्योंकि पिछले पांच साल में तानाशाह छूत हिन्दुओं ने अड़चनें डालकर हमारे प्रयास को विफल कर और