94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हिन्दू जो पिछले 5 साल से मंदिर प्रवेश सत्याग्रह से आहत हुए थे, वे दलितों के हिन्दू धर्म छोड़कर जाने के निर्णय से उल्लसित थे। अछूतों की ताजा घोषणा के प्रकाश में नासिक रथ जुलूस पर लगी रोक को तुरंत प्रभाव से हटाने का प्रार्थना पत्र जिलाधीश के कार्यालय में लगा दिया गया।
बुद्धिजीवीयों और राजनीति प्रेरित व्यक्तियों ने दलितों के निर्णय की निंदा की।
एक सिंधी हिंदू ने रक्त से लिखे पत्र द्वारा डॉ. अम्बेडकर को हिन्दुत्व त्यागने पर जान से मारने की धमकी दी’’ ख्,1, ।
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डॉ. अम्बेडकर के येवला भाषण पर गांधी जी की प्रतिक्रियाः
वर्धा, 15 अक्तूबर
एसोसिएटेड प्रेस प्रतिनिधि ने गांधी जी से डॉ. अम्बेडकर के भाषण के बारे में साक्षात्कार कर प्रतिक्रिया चाही, गांधी जी ने कहा ‘‘वह भाषण जिसके लिए डॉ. अम्बेडकर को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है पर उस विश्वास नहीं हो रहा। यदि उन्होंने यह भाषण दिया है और सभा में संकल्पबद्ध हिन्दुत्व से सब नाते तोड़ने व कोई ऐसा और धर्म जो उनको समता की गांरटी दे सके का प्रस्ताव पारित किया है, तो मैं इन दोनों घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं, विशेषतया तब जब कभी कभार हुई, कोई छुटपुट घटना को छोड़कर अस्पृश्यता अंतिम सांसे गिनने में है।
मैं डॉ. अम्बेडकर जैसी पुण्य आत्मा और उच्च शिक्षा प्राप्त मनुष्य के प्रति काविठा तथा दूसरे गांवों में उनके साथ किए गए अत्याचार के क्रोध का अनुमान सकता हूं।
परन्तु धर्म कोई घर या अंगवस्त्र नहीं है जो जब जी चाहे बदल लो। यह तो हमारे शरीर तथा आत्मा का एक अभिन्न अंग है। धर्म किसी भी जन को उसके सृजनकर्ता से जोड़ता है जबकि शरीर नश्वर है और मनुष्य इस का नाश होता है परन्तु धर्म का अस्तित्व तो मृत्यु के बाद भी है।
अगर डॉ. अम्बेडकर की ईश्वर में आस्था है तो मैं उन्हें प्रेरित करना चाहूंगा कि वे अपने रोष को शांत कर अपनी स्थिति पर पुनः विचार करें और अपने पूर्वजों के धर्म का आकलन उसके अपने महत्व व गुणां के आधार पर करें, न कि अविश्वस्त अनुयाइयों की कमजोरियों के आधार पर।
अंत में, मैं आश्वस्त हूं कि उनके तथा उनके साथ जिन्होंने संकल्प किया था और जो उन्हांने सोचा है, वे उसमें सफल नहीं हो पाएंगे क्यांकि दसियों लाख
12.34 विविध वृत 3 नवम्बर 1935 बम्बई क्रानिकल, 16 अक्तूबर, 1935 गांधी जी के धर्म परिवर्तन लेख के लिए देखें अनुक्रमांक कीर, पृष्ठ सं. 256-258