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अनपढ़ देहाती हरिजन लोग जब पाएंगे कि डॉ. अम्बेडकर और उसके अनुयाइयों ने पूर्वजों की धरोहर आस्था को अपना मानने से इन्कार कर दिया है विशेषकर जब वे अपने और सवर्ण हिन्दूओं के साथ भले-बुरे जीवन के क्षणों को पेड़ तथा लता के मानिंद सम्बन्धों का स्मरण करेंगे- एन.पी.।
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गांधी जी की प्रतिक्रिया पर डॉ. अम्बेडकर का मतः
‘‘ बम्बई, 15 अक्तूबर
एसोसिएटेड प्रेस के प्रतिनिधि ने जब डॉ. अम्बेडकर को, नासिक भाषण पर गाधी जी का वक्तव्य दिखाया, तो उन्होंने घोषणा की ‘‘हमने अभी निर्णय नहीं लिया है कि किस धर्म को अपनाएगें, क्या योजना व साधन हम प्रयोग करेंगे, परन्तु गहन विचार तथा विचारों के अदान-प्रदान के पश्चात हम इस दृढ निर्णय पर पहुंचे हैं कि हिन्दू धर्म हमारे हित में नहीं है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘असमानता ही वह तथ्य है जो बहस का आधार है और उसकी भी उसी की शाखाऐं हैं, इनके चलते दलित जातियां कभी भी पनप नहीं सकीं। कोई भी यह न सोचे कि मैंने यह क्रोधवश कहा है या काविठा गांव या किसी भी और स्थान पर दलितों के साथ हुई ज्यादतियों के विरोध में रोष और आवेगवश किया है। यह गहरे चिंतन और सोच समझ से लिया गया निर्णय है। धर्म आवश्यक है, गांधी जी की इस बात से तो मैं सहमत हूं परन्तु यह बात कि मनुष्य को अपने पूर्वजों के धर्म से ही जुड़ा रहना चाहिए, चाहे वह धर्म उसकी सोच में अति अरुचिकर हो और जो उसके नैतिक व्यवहार के माप दण्ड पर खरा न उतरता हो, चाहे जीवन में प्रगति तथा कुशलक्षेम के लिए प्रेरित न करता हो, से मैं सहमत नहीं हूं।’’
उनसे यह पूछने पर कि वे धर्म परिवर्तन कब तक करने की सोच रहे हैं या यह एक व्यक्तिगत निर्णय तक रहेगा या जनसमूह धर्म परिवर्तन होगा, उसके उत्तर में डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘मैंने धर्म परिवर्तन करने का अपना मन बना लिया है। अगर जन समूह इसके लिए आगे नहीं आता तो मुझे इसकी चिंता नहीं है। इसका निर्णय उन्हें लेना है। अगर उन्हें यह अच्छा लगेगा तो वे मेरा अनुसरण करेंगे और अगर अच्छा नहीं लगेगा तो वे मेरे उदाहरण पर नहीं चलेंगे। मेरी अपनी सलाह है कि गांधी जी इस विषय पर दलितों को अपनी रूपरेखा निर्धारित करने का अवसर दें। काविठा कोई छुटपुट या इक्का-दुक्का घटना नहीं है परन्तु यह तो हिन्दुओं के पूर्वजों के धर्म की कार्य प्रणाली का आधार है।’’ ख्1,
1 बंबई क्रानिकल, 10 अक्तूबर, 1935