96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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मेरी योग्यता तथा प्रतिष्ठा मेरी कड़ी मेहनत और बुद्धि के
फल हैं
रविवार 8 दिसम्बर, 1935 को फ़ोरस मार्ग बम्बई में जनसभा हुई। येवला
में डॉ. अम्बेडकर की धर्म परिवर्तन की घोषणा के बाद बम्बई में यह पहली जनसभा
थी। इस सभा में लगभग 10,000 अछूतों, के साथ 50-75 मुस्लिम और कुछ ईसाई
उपस्थित थे। सभा की अध्यक्षता डॉ. सोलंकी ने की। श्री देवराव नायक ने परिचयात्मक
व्याख्या की और इसके बाद सुर्वा टिपनिस का भाषण हुआ। सर्वश्री डोंडे और बापू
साहेब सहस्त्रबुदे भी उपस्थित थे। ख्1,
‘‘डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने घोषणा की कि धर्म परिवर्तन के विषय पर प्रथम
महार अधिवेशन में निर्णय लिया जाएगा जिसकी संभावनाओं पर वे सोच विचार
कर रहे थे। प्रेस में पत्रों की तो मानो बरसात हो रही थी, उनमें से अधिकतर में
डॉ. अम्बेडकर की भर्त्सना तथा निंदा थी और अल्पमत ने इसका समर्थन किया
था। ऐसे लेखों और पत्रों में एक पत्र किसी अर्ध-समाज सुधारक का था और उसने
धमकी भरी भाषा में लिखा था कि डॉ. अम्बेडकर अगर हिन्दू धर्म त्याग कर बाहर
जाएंगे तो वे नगण्य हो जाएंगे क्योंकि उसके विचार में डॉ. अम्बेडकर की प्रतिष्ठा
उनके अस्पृश्य/अछूत होने के कारण थी। डॉ. अम्बेडकर ने भी अपने ही अन्दाज
में जवाब दिया कि उनकी योग्यता तथा प्रतिष्ठा उनके धैर्य, परिश्रम और ज्ञान के
फल हैं और इसलिए वे अपनी व्यक्तिता/विशिष्टता कहीं भी किसी भी आस्था में
या साहित्यकारों, या आदरणीय राजनीतिज्ञ, चाहे ब्राह्मण हो या गैर ब्राह्मण के बीच
बनाये रख पाऐंगे। यद्यपि उन्होंने जोड़ा कि अगर किसी और आस्था या धर्म के
अंर्तगत उनके दलित भाई संपन्नता प्राप्त करने में सफल होते हैं, तो वे बिना प्रतिष्ठा
के जीवन को भी पसन्द करेंगे।
1 जनता, 15 दिसंबर, 1935
2 कीर, पृष्ठ 260