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हम कहीं भी रहें, हमें अपने कल्याण के लिए संघर्ष करना
होगा
येवला की धर्म परिवर्तन घोषणा से हिन्दुओं में प्रतिक्रियाओं की लहर आ
गयी थी। हिन्दू अछूतों का इस घोषणा का समर्थन निरंतर बढ़ता जा रहा था।
11 और 12 जनवरी, 1936 को पूना में इस घोषणा के समर्थन में महाराष्ट्र अछूत
नवयुवक संघ ने एक सभा का आयोजन किया। मद्रास के एक ख्याति प्राप्त नेता
प्रोफेसर एन. शिवराज ने इस अधिवेशन की अध्यक्षता की। लगभग 10,000 नर तथा
नारियों ने इस सभा में भाग लिया। कुछ सवर्ण हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख भी इस
सभा में उपस्थित थे। ख्1,
अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री शिवराज ने कहा, ‘‘दलितों को अस्पृश्यता से
निजात पाने के लिए उन्हें हिन्दू धर्म को त्याग देना चाहिए। परन्तु यह आवश्यक
नहीं है कि अस्तित्व में जो धर्म हैं, उनमें से किसी एक धर्म को ही अपनाया जाए।
शायद एक नया धर्म शुरू किया जा सकता है या एक पुरातन धर्म जो आर्यों के
भारत आगमन से पहले प्रचलित था को पुनर्जीवित किया जा सकता है। आर्य अपने
साथ भारत में हिन्दुत्व और उसके साथ जुड़ीं भिन्न-भिन्न प्रथाऐं लेकर आये थे’’।
डॉ. सोलंकी के बाद डॉ. अम्बेडकर बोले। अपने भाषण में डॉ. अम्बेडकर ने
चेतावनी दी कि कुछ लोगों में यह गलत धारणा है कि धर्म परिवर्तन उनको सदा के
लिए नरक से उठा कर सीधे समता के स्वर्ग में स्थापित कर देगा। उन्होंने आगे कहा
कि किसी भी नये धर्म में उन्हें स्वतंत्रता और समता के लिए संघर्ष करना आवश्यक
होगा। उन्होंने कहा कि हम पूरी तरह इस तथ्य से परिचित हैं कि हम कहीं भी जाएं,
किसी भी धर्म को अपनाएं, हमें अपने कल्याण के लिए संघर्ष करना होगा। चाहे तो
हम ईसाई, इस्लाम या सिक्ख धर्म धारण करें। ऐसा सोचना हमारी मूर्खता होगी कि
अगर हम इस्लाम अपना लेते हैं तो हम सबके सब नवाब बन जाऐंगे या ईसाई बने
तो सीधे पोप द्वितीय। हम कहीं भी जाएं संघर्ष तो हमें करना ही होगा’’। उन्होंने
1 जनता : 8 और 15 फरवरी, 1936