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मैंने हिन्दू धर्म त्यागने का निर्णय लिया है
मार्च, 1936 के अंत में ‘जात-पात तोड़क मंडल, लाहौर’ ने डॉ. बी. आर. अम्बेडकर को सूचना दी कि उन्होंने होने वाली सभा को मई के मध्य तक स्थगित कर दिया है। पंजाब प्रेस उत्तेजक हो रही थी और रूढि़वादी जनता ने डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को मंडल का अध्यक्ष चुनने पर मंडल की कड़ी और कटु आलोचना की, क्योंकि उन्होंने डॉ. अम्बेडकर को हिन्दू धर्म से घृणा करने वाला घोषित कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि भाई परमानन्द, डॉ. नारंग, महात्मा हंस राज और राजा नरेन्द्र नाथ जैसे कट्टर नेताओं को मंडल से संबंध विच्छेद करना पड़ा। मंडल के प्रकाश स्तंभ संतराम ने हर भगवान को डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को मंडल की स्थिति से अवगत कराने बम्बई भेजा। हर भगवान बम्बई में 9 अप्रैल को डॉ. बी.आर. अम्बेडकर से मिले और अध्यक्षीय भाषण का तैयार अंश उनसे ले लिया।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने भी बम्बई से अमष्तसर के लिए 10 अप्रैल 1936 को ‘‘सिक्ख धर्म प्रचारक अधिवेशन’’ में षामिल होने को प्रस्थान किया। यह अधिवेशन 13 व 14 अप्रैल को था। इस अधिवेशन में बड़ी संख्या में पंजाब, केरल संयुक्त प्रदेश और मध्य प्रांत से सिक्खों और दलित जातियों के जन-समूहों ने उपस्थिति दर्ज कराई। इस अधिवेशन की अध्यक्षता एक सेवा निवश्त जिला न्यायाधीश सरदार बहादुर हुक्कम सिंह ने की और स्वागत समिति के सभापति बसाखा सिंह थे। अध्यक्ष और सभापित दोनों ने अपने-अपने भाषणों में दलित जातियों की दशा सुधारने हेतु गहन धर्म प्रचार कार्यों पर ध्यानपूर्वक उपयुक्त अमल करने पर जोर दिया।
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अधिवेशन को संबोधित करते हुए सिक्खों में समता के सिद्धान्तों के प्रति अपनी स्वीकृति जताई और बताया कि यद्यपि उन्होंने हिन्दू धर्म को त्यागने का निर्णय तो ले लिया है परन्तु किसी दूसरे धर्म के बारे में उन्होंने अभी मन नहीं बनाया।
एक अन्य वक्ता सर जोगेन्द्र सिंह ने धर्म प्रचार कार्य के साथ-साथ इस प्रयोजन के लिए एक न्यास का सृजन करने का सुझाव दिया तथा श्रोताओं से धन राशि दान करने की विनती की। इस अधिवेशन की अन्य प्रमुख विशेषता केरल से पांच विशिष्टथिया जाति दलित जाति नेताओं का डॉ. कुट्टीर के नेतृत्व में और संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत से अन्य पचास लोगों का सिक्ख धर्म में प्रविष्ट होने के लिए आगमन था।’’ ख्1,
1 कीर, - पृष्ठ सं. 267