27. 1.5.1936 मैं सफलता के लिए अपनी आत्मा का बलिदान नहीं कर सकता। - Page 121

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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मैं सफलता के लिए अपनी आत्मा का बलिदान नहीं कर

सकता

जब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर 1 मई, 1936 की सुबह वार्धा पहुंचे तो दलित वर्ग के लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। जब तक डॉ. अम्बेडकर वार्धा ठहरे ‘‘निर्भय तरुण संघ’’ ने उनके बारे में सभी प्रकार की सावधानी बरती। डॉ. अम्बेडकर नालवाड़ी भी गये। मध्याह्न पूर्व 11ः30 पर दलित वर्ग के नेतागण सर्वश्री पुरुषोतम

खापरड़े, शंकरराव सोनवाने, गोमाजी टेम्भरे ने डॉ. अम्बेडकर से धर्म परिवर्तन से जुड़े विषयों के बारे में चर्चा की। डॉ. अम्बेडकर ने बिना किसी लाग लपेट के स्पष्ट तौर पर कहा :-

‘‘अभी तक मैं किसी को भी इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने की सिफारिश नहीं करता। अगर कोई भी अपने उत्तरदायित्व पर इस्लाम धर्म या किसी अन्य धर्म के अनुयायी की अनुशंसा पर धर्म अपनाता है और धोखा खाता है तो उस कृत्य का मैं उत्तरदायी नहीं हूंगा। यह भी एक तथ्य है कि मैंने धर्म परिवर्तन के बारे में घोषणा की है। परन्तु अभी तक किसी धर्म विशेष के अपनाने के बारे कुछ नहीं कहा। उस समय तक सभी धर्म परिवर्तन की बात का प्रचार तो करेंगे परन्तु किसी धर्म विशेष का नाम प्रसारित न करें। जब मैं घोषणा करूंगा तभी सब के सब 7 करोड़ अछूत एक साथ धर्म परिवर्तन करेंगे।’’

तत्पश्चात डॉ. अम्बेडकर ने दूसरे अछूत नेताओं से एकान्त में वार्ता की। ख्1,

कीर ने डॉ. अम्बेडकर की वार्धा यात्रा का वर्णन इस प्रकार किया।

‘‘अब डॉ. बी.आर. अम्बेडकर की गतिविधियों से गांधी शिविर की शांति भंग होने लगी थी। इसलिए सेठ वालचंद हीराचंद ने तर्क से डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को गांधी से मिलने को राजी किया। डॉ. अम्बेडकर और वालचंद पहले वार्धा और बाद में सेगांव ख्2, में गांधी से मिले परन्तु समस्या के समाधान संबंधी कोई सहमति

123 महाराष्ट्र दैनिक, 6 मई, 1936, पुनः मुद्रित को सारे पृष्ठ 296 बाद में इसका नाम सेवा ग्राम पड़ा गांधी एम.के. के पत्र सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पृष्ठ सं. 15