114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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में बिताते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर किसी हिन्दू ने किसी मुसलमान पर बिना उकसाये आक्रमण किया तो पंजाब से मद्रास तक का पूरा मुसलमान समुदाय उनके संरक्षण के लिए हर हालत में धावा बोलने पंहुच जाएगा। इसके विपरीत, हिन्दू पूरी तरह आश्वस्त हैं कि अछूतों को बचाने कोई नहीं आएगा, कोई तुम्हारी सहायता नहीं करेगा, कोई धन राशि तुम तक नहीं पहुंचेगी और चाहे कुछ भी हो जाए कोई अधिकारी भी तुम्हारी सहायता नहीं करेगा। तहसीलदार तथा पुलिस छूत हिन्दुओं में से हैं और छूतों तथा अछूतों में किसी विवाद की दशा में वे अपनी जाति का पक्ष लेते हैं न कि अपने कर्तव्य का। हिन्दू तुम्हारे साथ अन्याय व तानाशाही केवल तुम्हारे असहाय होने के कारण करते हैं। ऊपर की चर्चा से दो तथ्य स्थापित होते हैं। पहला, बिना शक्ति के आप अत्याचार व तानाशाही का मुकाबला नहीं कर सकते तथा दूसरा कि तानाशाही का विरोध करने के लिए आप में पर्याप्त सक्षमता नहीं है। यह दो तथ्य सिद्ध होने पर तीसरा तथ्य अपने आप परोक्ष में आता है कि तानाशाही का विरोध करने के लिए शक्ति बाहर से प्राप्त करने की आवश्यकता है। आपको यह शक्ति बाहर से कैसे प्राप्त करनी है एक महत्वपूर्ण प्रश्न है और बिना किसी पूर्वाग्रह के हमें इस प्रश्न पर गहन चर्चा करनी पड़ेगी।
सामर्थ्य बाहर से प्राप्त करना आवश्यक है
मुझे ऐसा लगता है, इस देश में जातिवाद और धार्मिक मताधंता का लोगों के दिमाग व नैतिकता पर एक अनोखा प्रभाव होता है। इस देश में किसी को भी लोगों की निर्धनता तथा कष्ट को देखकर बुरा नहीं लगता यानि कोई सहानुभूति नहीं होती और अगर किसी को दर्द की अनुभूति होती है तो वह कष्ट को समाप्त करने का प्रयास नहीं करता। लोग केवल अपनी ही जाति तथा धर्म के लोगों की निर्धनता, दुःख व कष्ट में सहायता करते हैं। यद्यपि यह नैतिकता से विमुखता को दर्शाता हैं, पर हम यह न भूलें कि इस देश में यही चलन हैं। गावों में छूत, अछूतों का शोषण करते हैं, का ये अर्थ नहीं है कि उन गांवों में दूसरे धर्म के लोग नहीं रहते और उनको स्पष्ट तौर से अछूतों के साथ अन्यायपूर्ण दुर्व्यवहार का ज्ञान नहीं है या इस बात का ज्ञान नहीं कि छूतों का अछूतों पर अत्याचार करना अति अनुचित है। परन्तु उनमें से कोई भी अछूतों के बचाव में आगे नहीं आता। इसके पीछे क्या कारण हैं? अगर आप किसी से प्रार्थना भी करते हैं तो वह तुम्हारी सहायता क्यों नहीं करता, उसका उत्तर यह है कि हर किसी क्षेत्र में हस्तक्षेप करना उनके अधिकार में नहीं है और अगर आप उनके धर्म के अनुयायी होते तो वे आपकी सहायता अवश्य करते। इससे आपको स्पष्ट हो गया होगा कि किसी दूसरे समाज से गहरे सम्बन्ध बनाए बिना या उनके धर्म के अनुयायी बने बिना आपको बाहर से षक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। उसका स्पष्ट अर्थ है कि आप अपना धर्म अवश्य छोड़ें और किसी दूसरे