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समाज में सम्मिलित हो जाओ। इसके बिना आपको उस समाज की शक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। जब तक आपको बाहर से सामर्थ्य प्राप्त नहीं होता तब तक आप और आपकी आगे आने वाली पीढि़यों को इसी दयनीय अवस्था में अपना जीवन व्यतीत करना होगा।
धर्म परिवर्तन का आध्यात्मिक पक्ष
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अभी तक भौतिक लाभ पाने के लिए धर्म परिवर्तन क्यों जरूरी हैं, पर हमने चर्चा की है। अब मैं अपना मत आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं कि आध्यात्मिक सुख के लिए धर्म परिवर्तन क्यों आवश्यक हैं। धर्म किसलिए है? इसकी आवश्यकता क्यों है? आइए हम इसे समझें। आप पाएंगे कि विभिन्न लोगों ने धर्म को अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया है। परन्तु इन सभी परिभाषाओं में एक ही सबसे ज्यादा अर्थपूर्ण और सर्व स्वीकृत है। जो लोगों के ऊपर शासन करे वह धर्म है। धर्म की यही एक सही परिभाषा है। यह परिभाषा मेरी नहीं है। सनातनी हिन्दुओं के सबसे अग्रणीय नेता श्रीमान तिलक इस परिभाषा के लेखक हैं। अतः कोई भी मुझ पर धर्म की परिभाषा में गलत आकलन का दोष नहीं लगा सकता। यद्यपि यह परिभाषा मैंने नहीं दी है, ऐसा नहीं है कि मैंने इसे केवल तर्क के लिए स्वीकार कर लिया है। मैं इसे स्वीकार करता हूं। धर्म का अर्थ है समाज को कायम रखने के लिए नियमों को थोपना। धर्म के बारे में मेरी भी यही धारणा है। यद्यपि यह परिभाषा वास्तविकता और तर्क के आधार पर सही लगती है परन्तु समाज पर शासन के लिए बनाए नियमों की प्रकृति के बारें में कुछ भी नहीं दर्शाती। समाज के चलन के लिए नियमों की प्रकृति के बारे में अभी भी प्रश्न बना हुआ है। यह प्रश्न धर्म की परिभाषा से ज्यादा महत्वपूर्ण है। क्योंकि धर्म की परिभाषा से यह सुनिश्चित नहीं होता कि कौन कृत्य धर्म है और कौन कृत्य धर्म नहीं है। परन्तु जहां नियम समाज को बांधते हैं वहीं नियमों की प्रकृति और प्रयोजन से समाज का शासन प्रभावित होता है। धर्म की प्रकृति क्या हो? इसके उत्तर पर निर्णय करते समय एक और प्रश्न उभर कर आता है कि मानव और समाज में क्या सम्बन्ध होना चाहिए। आधुनिक दार्शनिकों की इस प्रश्न के उत्तर में तीन अभिधारणाऐं दी हैं। कुछ ने कहा है कि समाज का अन्तिम लक्ष्य व्यक्तिगत लक्ष्य प्राप्त कराना है। कुछ दार्शनिकों का मत है कि मनुष्य के अनुवांशिक गुणों और क्षमताओं का विकास जिससे वह व्यक्ति अपनी उच्चता प्राप्त करने में सफल हो’’, समाज का दायित्व है। कुछ दावा करते हैं कि सामाजिक संगठन का महत्वपूर्ण उददे्श्य व्यक्तिगत विकास और प्रसन्नता नहीं है परन्तु एक आदर्श समाज का निर्माण करना है। हिन्दू धर्म की धारणा इन तीनों धारणाओं से बिल्कुल भिन्न है। हिन्दू धर्म में किसी एक व्यक्ति का कोई स्थान नहीं है। हिन्दू धर्म