29. 31.5.1936 मुक्ति का मार्ग क्या है? - Page 137

116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वर्गीकरण की धारणा पर निर्मित है। हिन्दू धर्म एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के प्रति व्यवहार के बारे में कोई उपदेश नहीं देता। निजी तौर पर एक धर्म जो व्यक्तिगत इकाई के महत्व को स्वीकृत प्रदान नहीं करता मुझे मान्य नहीं है। यद्यपि समाज एक व्यक्तिगत आवश्यकता है, केवल सामाजिक कल्याण धर्म का अन्तिम लक्ष्य नहीं हो सकता है। मेरे अनुसार व्यक्ति का कल्याण और विकास धर्म का वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए। यद्यपि हर व्यक्ति समाज का अंग है, व्यक्ति का समाज के साथ सम्बन्ध शरीर और अंग या ठेले और इसके पहिए की भांति नहीं है।

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समाज और व्यक्ति

मनुष्य का व्यवहार पानी की बूंद की तरह नहीं बिल्कुल भिन्न है क्योंकि पानी की बूंद समुद्र में गिरकर समुद्र में ही समा कर अपनी पहचान खो देती है इसके विपरीत मनुष्य समाज में रहकर भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है। आदमी का जीवन स्वतंत्र है, वह समाज सेवा के लिए पैदा नहीं हुआ अपितु अपने विकास के लिए हुआ है। केवल इसी कारण विकसित देशों में एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को दास नहीं बना सकता। वह धर्म जिसमें एक व्यक्ति का कोई महत्व नहीं है, यह मुझे स्वीकार नहीं है। हिन्दूतत्व एक व्यक्ति विशेष के महत्व को स्वीकार नहीं करता इसलिए यह मुझे स्वीकार नहीं है। मैं उस धर्म को स्वीकार नहीं करता जिसमें केवल एक वर्ग को ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है दूसरे को अस्त्र धारण करने का अधिकार प्राप्त है, तीसरे को व्यापार और चौथे को केवल सेवा। हर एक को ज्ञान की आवश्यकता है, हर एक को शस्त्रों की आवश्यकता है, हर एक को धन चाहिए। वह धर्म जो यह सब भूल जाता है और केवल कुछ को शिक्षित करना और शेष सबको अंधेरे में रखता है, एक धर्म नहीं परन्तु मानसिक दासता के लिए एक षड़यन्त्र है। एक धर्म जो एक को अस्त्र धारण करने को कहता है और दूसरे पर रोक लगाता है, धर्म नहीं है । एक दूसरे को जन्म जन्मान्तर तक दास बनाए रखने की धूर्तता की चाल है। वह धर्म जो कुछ के लिए सम्पदा प्राप्त करने का रास्ता खोलता है और दूसरों के रोजमर्रा के जीवन की जरूरतों के लिए निर्भर रहने का दबाव डालता है, एक धर्म नहीं बल्कि स्वार्थपूर्ति है। इसको हिन्दुत्व में चर्तुवर्ण कहा गया है। मैंने इसके बारे में अपना पक्ष रख दिया है। अब आप विचारें कि क्या हिन्दुत्व आपके लिए लाभप्रद है? बुनियादी विचार से धर्म का कर्तव्य किसी भी व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास का वातावरण तैयार करना है। यदि आप इससे सहमत हैं तो यह स्पष्ट है कि आप हिन्दुत्व में अपना विकास बिल्कुल नहीं कर सकते। किसी भी व्यक्ति को अपना स्तर पर ऊंचा करने के लिए तीन तत्वों की आवष्यकता है। सहानुभूति, समता और स्वतंत्रता। क्या आप अपने अनुभव से कह सकते हैं कि इन तीनों तत्वों में से कोई भी तत्व आपके लिए हिन्दुत्व में विद्यमान है?