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क्या हिन्दुत्व में आपके लिए कोई सहानुभूति है?
जहां तक सहानुभूति का प्रश्न है इसका अस्तित्व नहीं है। आप कहीं भी जाओ आपको सहानुभूति से कोई देखता भी नहीं हैं। आप सबको इसका खूब अनुभव है। हिन्दुओं में आपके प्रति कोई बंधुत्व नहीं है। आपके साथ विदेशियों से भी अधिक बुरा व्यवहार होता है। अगर गांव में रहने वाले हिन्दुओं और अछूतों पर दृष्टिपात करें तो कोई भी उनको भाई नहीं मानेगा। वे तो एक लड़ाई के मैदान में विरोधी सेनाओं की तरह ज्यादा दिखते हैं। हिन्दुओं का आपके प्रति उतना भी आकर्षण नहीं है जितना कि मुस्लिमों के साथ है। वे मुस्लिमों को आपसे ज्यादा नजदीक समझते हैं। स्थानीय बोर्ड, विधान परिषद और व्यापार में हिन्दू और मुस्लिम एक दूसरे की सहायता करते हैं। क्या आप एक भी ऐसा दृष्टान्त बता सकते हैं, जिसमें छूत हिन्दुओं ने आपके प्रति सहानुभूति दिखाई हो। इसके विपरीत, उन्होंने आपके प्रति घृणा का बीज बोया। वे लोग जो अदालत में न्याय मांगने गए या पुलिस की सहायता के लिए गए उनको इस भयानक घृणा के लिए क्या-क्या झेलना पड़ा, उन्हीं से सुना जा सकता है। क्या आप में से कोई भी विश्वस्त है कि उसको अदालत से न्याय या पुलिस से सही सहायता मिलेगी? अगर नहीं तो आपके प्रति यह घृणा के बीज बोने का क्या कारण है? मेरे विचार से इस अविश्वास का एक ही कारण है। आप विश्वास करें कि हिन्दू अपनी शक्ति का प्रयोग उचित ढंग से नहीं करेंगे क्यांकि उन्हें आपसे सहानुभूति नहीं है। अगर यह सत्य है तो ऐसी घृणा के बीच में रहने का क्या अर्थ है?
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वास्तव में, यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए। अस्पृश्यता कुछ नहीं बल्कि एक ठोस असमानता है। असमानता की जीता जागता ऐसा उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा। दुनिया के इतिहास में किसी भी समय अस्पृश्यता से ज्यादा गंभीर असमानता नहीं मिलेगी। उच्चता और हीनता की भावनाओं के आधार पर एक अपनी बेटी का ब्याह नहीं कर सकता या एक दूसरे के साथ मिलकर भोजन नहीं कर सकते। असमानता के ऐसे बहुत उदाहरण हैं। विश्व में कहीं भी हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज के अतिरिक्त ऐसा कोई धर्म नहीं है जिनमें एक मानव को दूसरे से नीचा माना जाता हो और उसके छूने पर रोक हो? क्या कोई विश्वास करेगा कि कोई ऐसा भी पशु हैं जिसको मनुष्य कहते हैं परन्तु मात्र उसके छूने से पानी दूषित हो जाता है। ईष्वर भी भ्रष्ट होकर पूज्यनीय नहीं रहता? क्या एक अछूत और कुष्ट रोगी से किए जाने वाले व्यवहार में कोई अन्तर है? यद्यपि कुष्ठ रोगी को हाथ लगाने में लोगों को घृणा होती है परन्तु उनके मन में कुछ