118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सहानुभूति तो होती है। आपको देखकर लोगों को उबकाई जैसा अनुभव होता है और उनके मन में आपके प्रति घृणा भरी है। इस प्रकार आपकी दशा एक कुष्ठ रोगी से भी बुरी है। आज भी अगर कोई उपवास खोलते समय किसी माहर की आवाज़ सुन लेता है तो वह भोजन को हाथ नहीं लगाता। आपके शरीर और शब्दों को ऐसे मल से जोड़ा गया है। कुछ लोग कहते हैं कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म के नाम पर एक काला धब्बा है। इस कथन का कुछ भी अर्थ नहीं निकलता। क्योंकि कोई भी हिन्दू, हिन्दू धर्म को एक धब्बा नहीं मानता। हिन्दुओं में बहुतायत से यह धारणा है कि आप लोग एक धब्बा हो क्योंकि आप अशुद्ध हो। इस दशा तक आप कैसे पहुंचे? मेरे विचार से आपको इस दशा में धकेल दिया गया क्योंकि आप हिन्दुत्व से जुड़े रहे। आप में से जो मुस्लिम बन गए, हिन्दू उन्हें न तो अछूत मानते हैं और न ही असमान मानते हैं। ये ही मापदण्ड उन पर लागू होता है जो ईसाई बन गए। क्योंकि हिन्दू उन्हें भी न अछूत और न ही असमान मानते हैं। त्रावणकोर में हुई घटना का दृष्टान्त सुनाने लायक है। उस क्षेत्र के थिया कहलाने वाले अछूतों के गली में चलने पर रोक है। कुछ दिन पहले इनमें से कुछ ने सिक्ख धर्म अपना लिया। तुरन्त प्रभाव से उनके सड़क पर चलने को लगी रोक को वापस ले लिया गया। इन सबसे यह सिद्ध होता है कि आपको अछूत और असमान मानने का कोई कारण है तो यह हिन्दू धर्म से सम्बन्ध होना ही है।
इस असमानता और अन्याय की स्थिति में कुछ हिन्दू अछूतों को शांत करना चाहते हैं। वे कहते हैं, ‘‘शिक्षा प्राप्त करो, स्वच्छ रहो और तब हम आपको छुएंगे और अपने समान मान लेंगे।’’ वास्तव में, हम सब अपने अनुभव से जानते है कि एक शिक्षित, धनी और स्वच्छ महार की दशा एक अशिक्षित, निर्धन और गंदे महार से कहीं अच्छी नहीं है। आओ हम अभी चिंतन करें कि यदि किसी को उसके अशिक्षित, निर्धनता या अच्छी पोशाक न होने से उसका आदर नहीं किया जाता तो एक सामान्य महार इसके लिए क्या करे? किसी को समानता कैसे प्राप्त हो सकती है जब उसको शिक्षा का अधिकार प्राप्त नहीं है, सम्पदा का अधिकार प्राप्त नहीं है और न ही अच्छी वेशभूषा का? ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म में समानता के सिद्धान्त का ज्ञान, धन और वेशभूषा से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि ये सब तो बाहर से दिखने वाले पक्ष हैं। ये दोनों धर्म मानवता की अनुभूति को दृष्टिगत करते हैं। वे यह उपदेश देते हैं कि सबको मानवता का सम्मान करना चाहिए और किसी को भी मानवता का अपमान नहीं करना चाहिए और कोई भी दूसरे को अपने से असमान न माने। ऐसे उपदेश हिन्दू धर्म में देखने को नहीं हैं। इस धर्म की क्या उपयोगिता है जहां मनुष्य की मानवीय चेतना का सम्मान नहीं होता? और इससे चिपकने का क्या लाभ? इसके उत्तर में कुछ हिन्दू उपनिषदों की बात करते हैं और गर्व से कहते हैं कि उपनिषदों के अनुसार ईश्वर