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सर्वव्यापी हैं। यहां यह कहा जा सकता है। कि धर्म और विज्ञान दो अलग चीजे हैं।
यहां यह समझना आवश्यक है कि कोई विशेष मत विज्ञान का नियम है या धर्म की
शिक्षा है। ‘ईश्वर सर्व व्यापक हैं, विज्ञान का एक नियम है धर्म का नहीं, क्योंकि धर्म
का सीधा सम्बन्ध मनुष्य के आचरण से है। ईश्वर का सभी जगह विद्यमान होना धर्म
शिक्षा नहीं है परन्तु विज्ञान का नियम है। इस कथन को इस बात से बल मिलता है
कि हिन्दुओं के कृत्य इस नियम के अनुरूप नहीं है। इसके विपरीत यदि हिन्दू आग्रह
करें कि ईश्वर की सर्वविद्यमानता दर्शनशास्त्र का नियम नहीं है, बल्कि धर्म का सिद्धान्त
है तो मेरा सरल सा उत्तर होगा कि पूरे विश्व में कहीं भी उन्होंने ऐसे संकुचित मनोवृत्ति
वाले नीच इंसान नहीं देखे जैसे हिन्दुओं में हैं। हिन्दुओं को उन अत्याचारियों की
श्रेणी में रखा जा सकता है जिनकी करनी व कथनी में उत्तर व दक्षिण ध्रुवों की दूरी
है। उनके मुंह में राम है तो बगल में छुरी। वे संतों की वाणी बोलते हैं परन्तु उनके
कृत्य कसाइयों वाले हैं। वे ईश्वर को सर्वव्यापक मानने का ढोंग करते हैं परन्तु मनुष्यों
के साथ पशुओं से भी बुरा व्यवहार करते हैं उनके संग मत रहो। वे जो चींटियों को
तो शक्कर खिलाते हैं परन्तु मनुष्यों को पीने के पानी पर प्रतिबन्ध लगा कर मारते
हैं उनसे संपर्क मत करो। आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि इनकी संगत का
आप पर क्या दुष्प्रभाव पड़ा है। आपने अपना सम्मान खो दिया है आपने अपना स्तर
गंवा दिया है। यह कहना कि केवल हिन्दू ही तुम्हारा सम्मान नहीं करते अपर्याप्त
है। केवल हिन्दू ही नहीं, मुस्लिम तथा ईसाई भी तुम्हें अधमों में सबसे अधिक अधम
गिनते हैं। सत्यता तो यह है कि इस्लाम तथा इसाई धर्म शिक्षा ऊंच और नीच का
भेदभाव पैदा नहीं करते। तब इन दोनों धर्मों के अनुयायी तुम्हारे साथ भेदभाव क्यों
करते हैं, इसका कारण है कि हिन्दू तुम्हें नीचा मानते हैं। अगर वे तुम्हें समानता का
स्तर दें तो उन्हें यह डर है कि हिन्दू उन्हें भी निम्न स्तर का मानेंगे। अतः मुस्लिम
और ईसाई दोनों ही हिन्दुओं की तरह अस्पृश्यता को मानते हैं। इस तरह हम केवल
हिन्दुओं की दृष्टि में ही नीचे नहीं हैं बल्कि हमारी गिनती पूरे भारत में हिंदुओं द्वारा
हमारे साथ किए जाने वाले व्यवहार के कारण सब से नीचे स्तर पर होती है। यदि
आपको इस लज्जाजनक दशा से मुक्ति पानी है यदि आपको अपने पर लगे कलंक
को दूर करना है और इस मूल्यवान जीवन को शोभामित करना है तो उसका केवल
एक मार्ग है कि हिन्दू धर्म तथा हिन्दू समाज को व्यर्थ समझकर त्याग दो।
क्या आपको हिन्दू धर्म में कोई स्वतंत्रता है?
कुछ लोग शायद कहें कि कानून ने दूसरे नागरिकों के समान आप को
व्यापार करने की स्वतंत्रता दी है। यह भी कहा जाता है कि दूसरों की तरह आप
को स्वतंत्रता का अधिकार है। ऐसे कथनों पर आप को गहराई से विचार करना होगा