29. 31.5.1936 मुक्ति का मार्ग क्या है? - Page 142

121

सकता है? मस्तिष्क की स्वंतत्रता ही सही अर्थों में स्वतंत्रता है। वह जिसका मस्तिष्क स्वतंत्र नहीं, वह सांखल के बन्धन में नहीं होने पर भी दास है। जिसका मस्तिष्क स्वतंत्र नहीं है जीवित होने पर भी मृतप्राय है। प्रत्येक व्यक्ति के अस्तित्व का प्रमाण मस्तिष्क स्वतंत्रता में निहित है। एक मानव के भीतर स्वतंत्रता की लौ मस्तिष्क में अभी बुझी नहीं है, का मापदण्ड या प्रमाण कैसे निर्धारित किया जाए? किसी के बारे हम यह निष्कर्ष कैसे निकालें कि वह मस्तिष्क से स्वतंत्र है? कोई भी सतर्क मानव जो अपने दायित्वों, अधिकारों व कर्तव्यों को समझता है, जो अपनी परिस्थितियों का दास नहीं है और विषम परिस्थिति को अपने अनूकूल बनाने को उत्सुक व प्रयासरत हो, मैं उसे स्वतंत्र मानता हूं। जो केवल इस तर्क पर कि यह उसे पूर्वजों से मिला है, व्यवहार, रीति रिवाज, परम्पराओं और धार्मिक उपदेशों में जकड़ा दास न हो और जिसकी तर्क की लौ बुझी नहीं है, मैं उसे स्वतंत्र मानता हूं। वह जिसने आत्मसमण् ार्ण नहीं किया है, जो दूसरों के उपदेशों पर नहीं चलता, जो जब तक कोई भी बात तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और जब तक आलोचनात्मक मापदण्ड पर तथा कारण और प्रभाव सिद्धान्त पर सही न हो, विश्वास नहीं करता, उसे मैं स्वतंत्र मानता हूं। जो सदैव अपने अधिकारों की रक्षा करने को तत्पर हो, जिसे लोक निन्दा का डर न हो, जिसमें पर्याप्त बुद्धि हो और इतना आत्मसम्मान भरा हो कि दूसरों के हाथ में खिलौना न बने, उसे मैं स्वतंत्र मानव मानता हूं। वह, जो अपना जीवन दूसरों के दिशा-निर्देश पर निर्धारित न करे, जो अपने जीवन को अपने तर्कानुसार निर्धाति करे और जो अपने जीवन का नेतृत्व कैसे करना है कौन से मार्ग पर ले जाना है, यह निर्णय स्वयं करे, उसे मैं स्वतंत्र मानव मानता हूं।

ऊपर लिखे कथनों के प्रकाश में क्या आप स्वतंत्र है? अपने उद्देश्य को तराशने के लिए क्या आप स्वतंत्र हैं? मेरे विचार से न तो आपको कोई स्वतंत्रता है और आप दास से भी बद्तर हैं। दासता में तुम्हारे तुल्य कोई नहीं। हिन्दु धर्म के अन्तर्गत किसी को भी बोलने की स्वतंत्रता नहीं हो सकती। जो भी हिन्दू धर्म का पालना करता है उसे अपने बोलने के अधिकार का समर्पण करना पड़ता है। उसे वेदों के अनुसार अनुपालन करना होगा। अगर कार्य शैली को वेदों से समर्थन नहीं मिलता तो निर्देश ‘स्मृतियों’ से प्राप्त करें। अगर किसी विषय पर स्मृतियों से भी दिशा न मिले तो महापुरूषों के पद चिन्हों पर चलें। हिन्दुत्व में अन्तःकरण, तर्क व विचारों का न तो कोई महत्व है और न ही कोई गुंजाइश। किसी भी हिन्दू को अनिवार्य रूप से वेदों या स्मृतियों या महापुरूषों की नकल का दास होना ही होगा। उससे अपनी तर्क शक्ति के उपयोग की आशा नहीं की जाती। अतः, जब तक आप हिन्दू धर्म के अधीन हैं, आपसे स्वतंत्र विचारों की उम्मीद नहीं की जा सकती है। कुछ लोग यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि हिन्दू धर्म ने मानसिक दासता केवल अछूतों