122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पर ही तो जबरन नहीं थोपी परन्तु यह स्वतंत्रता तो सभी हिन्दू समुदाय से छीनी
है। निःसन्देह यह एक सच्चाई है कि सभी हिन्दू मानसिक दासता की अवस्था
में जी रहे हैं। परन्तु इसका यह कतई अर्थ न लगाया जावे कि सबकी वेदना
की अनुभूति एक सी है। इस मानसिक दासता के बुरे प्रभाव हिन्दू धर्म के प्रत्येक
अनुपालक या अनुयायी पर एक से नहीं हैं। इस मानसिक दासता ने छूत हिन्दुओं
को आर्थिक पहलू पर कोई क्षति नहीं पहुंचाई। यद्यपि सभी छूत हिन्दू, ऊपर वर्णित
तिकड़ी (वेद, स्मृतियां तथा महापुरूष) के दास हैं परन्तु हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में
उन्हें उच्च स्तर पर रखा गया है। उनको दूसरों पर सत्ता करने का अधिकार दिया
गया है। यह एक अविवादित सत्य है कि छूत हिन्दूओं ने छूत हिन्दूओं के कल्याण
और खुशहाली के लिए ही हिन्दू धर्म की व्यूह रचना की। जिसे वे धर्म की संज्ञा देते
हैं, उस धर्म ने तुम्हें केवल दास की भूमिका दी। धर्म में वह सब व्यवस्था की गई
है कि तुम दासता से किसी भांति बच न सको। अतः आप को दासता की जंजीरों
तथा बंधनों को तोड़ने की आवश्यकता कहीं अधिक है, जितनी बाकी हिन्दुओं को
अभी नहीं। इस प्रकार, हिन्दूत्व ने तुम्हारा दोहरा नुकसान करते हुए तुम्हारी प्रगति
रोकी है। इसने अछूतों को मानसिक स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित व समाज से
निष्कासित कर तुम्हें दास बना दिया। इसने बाहरी विश्व में भी दासता की शर्तें लगा
कर अछूतों को विनाश की ओर धकेल दिया। अगर आप स्वतंत्रता चाहते हैं तो तुम्हें
अपना धर्म अवश्य बदलना चाहिए।
अछूतों का संगठन और धर्म परिवर्तन
वर्तमान में हो रहे अस्पृश्यता हटाओ आन्दोलन की इसलिए निंदा की जा
रही है क्योंकि अछूत वर्ग में अनेक जातियां एक दूसरे से आपसी व्यवहार में जातिय
दोषों में लिप्त ही नहीं वे अस्पृश्यता भी बरतते हैं। महार तथा मांग मिलकर भोजन
नहीं करते। इन दोनों जातियों के लोग कूड़े कबाड़ हटाने तथा झाड़ु लगाने वालों
को नहीं छूते और उनसे अस्पृश्यता बरतते हैं। इन लोगों का सवर्ण हिन्दुओं से
अस्पृश्यता न बरतने की मांग करने का क्या अधिकार है। जबकि वे स्वयं अस्पृश्यता
व जातिवाद बरत रहे हैं? यह प्रश्न हमेशा उठाया जाता है। अछूतों को उपदेश दिया
जाता है कि वे पहले आपस की अस्पृश्यता को दूर कर समाधान के लिए आएं। हमें
इस तर्क की सत्यता को स्वीकार करना पड़ता है। परन्तु इसमें लगाया आरोप गलत
है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अछूतों में सम्मिलित जातियां
वर्गवाद तथा अस्पृश्यता में लिप्त हैं। परन्तु उन पर लगाया यह आरोप कि वे इस
जुर्म के किसी प्रकार से अपराधी हैं सर्वथा गलत है। जातिवाद तथा अस्पृश्यता का
आरम्भ अछूतों से नहीं वरन सर्वण हिन्दुओं से हुआ है। जातिवाद तथा अस्पृश्यता के