29. 31.5.1936 मुक्ति का मार्ग क्या है? - Page 144

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नियम निर्धारण का पाठ पढ़ाया तथा इसका प्रयोग भी सवर्ण हिन्दुओं ने ही किया। अगर यह सत्य है तो इस जातिवाद व अस्पृश्यता का दायित्व सवर्ण हिन्दुओं पर ही है, न कि अछूतों पर। अगर यह पाठ गलत है तो इस झूठ के दोष का दायित्व उपदेश का है जिसने यह पाठ पढाया न कि उसका जिसने इसे स्मरण किया। यद्यपि यह उत्तर सही लगता है मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं। यद्यपि जातिवाद तथा अस्पृश्यता जिस की जड़ें हमारे बीच भी हैं के कारणों के लिए हम उत्तरदायी नहीं हैं तो क्या इस प्रथा की भर्त्सना न करना और जैसे यह चल रही है, यथावत बने रहने देना उचित है? यद्यपि जातिवाद व अस्पृश्यता के घुसने में दायित्व हमारा नहीं है यह तो हमारा दायित्व है कि इसे जड़ से समाप्त किया जाए। और मैं प्रसन्न हूं कि यह जिम्मेवारी हमने स्वीकार कर ली है। मुझे विश्वास है कि महार जाति में कोई ऐसा नेता नहीं है जो इस कुरीति का समर्थक हो। अगर इस बारे में कोई तुलना करनी है तो नेताओं में करनी होगी। यदि हम महार जाति के शिक्षितों और ब्राह्मणां के ब्राह्मणों में तुलना करें तो हमें यह मानना पड़ेगा कि अछूतों के शिक्षित वर्ग, जातियों के उन्मूलन के बारे में ज्यादा उत्सुक हैं। यह तथ्य स्वेच्छा से किए कार्यों से भी सिद्ध होता है। महारों में केवल शिक्षित ही नहीं यहां तक कि अशिक्षित व अनपढ़ महार भी जाति उन्मूलन आन्दोलन के नेतृत्व में अगुवाई करने को आतुर हैं। यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि आज के दिन महार समुदाय में एक भी ऐसा नहीं है जो महार तथा मांग के अंतर्जातीय भोज का विरोध करे। मुझे बहुत संतोष का अनुभव हो रहा है, कि आपने जाति उन्मूलन की आवश्यकता के ‘यथार्थ’ को स्वीकार किया है तथा इसके लिए मैं आप सबको हार्दिक बधाई देता हूं। क्या आप ने कभी सोचा है कि अछूतों में जातिवाद तथा अस्पृश्यता उन्मूलन के प्रयासों को सफल कैसे बनाया जा सकता है? केवल छुटपुट अंतर्जातीय भोजों व अंतर्जातीय विवाहों से जाति उन्मूलन लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता। जाति मस्तिष्क की मनोदशा है, यह मस्तिष्क का रोग है। हम जातिवाद का पालन करते हैं तथा अस्पृश्यता को व्यवहार में लाते हैं क्योंकि हिन्दू धर्म हमें ऐसा करने को कहता है तथा हम हिन्दू धर्म के बीच रहते हैं। एक कड़वी वस्तु को मीठा बनाया जा सकता है। नमकीन तथा कड़वे स्वाद वाली वस्तुओं का स्वाद बदला जा सकता है। परन्तु विष से अमृत नहीं बनाया जा सकता। हिन्दुत्व में रहते जातिवाद के उन्मूलन की बात करना विष को अमृत में बदलने के समान है।

संक्षेप में, जब तक हम हिन्दू धर्म के अनुयायी है और वह धर्म एक मनुष्य से गंदगी के जैसा व्यवहार करने की सीख देता है, भेदभावपूर्ण बोध हमारे मस्तिष्क में गहरा पैठा है। इसे गिराया नहीं जा सकता। अछूतों में आपसी अस्पृश्यता तथा जाति उन्मूलन के लिए, धर्म परिवर्तन ही विष कम करने की उपयुक्त दवा है।