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कर दिया है तो मैं आपसे पूछना चाहूंगा कि अगर आप नाम बदलने को आवश्यक समझते हैं तो धर्म परिवर्तन में कोई आपत्ति क्यों? धर्म परिवर्तन भी नाम परिवर्तन की तरह ही है। धर्म परिवर्तन के साथ नाम परिवर्तन आपको अधिक लाभप्रद रहेगा। अपने आपको एक मुस्लिम, एक इसाई, एक बौद्ध या एक सिक्ख कहना केवल धर्म परिवर्तन ही नहीं, नाम परितर्वन भी है। यह परिवर्तन एक वास्तविक परिवर्तन है। इस नाम के साथ गंदगी नहीं लगी, यह एक सशक्त परिवर्तन है। कोई इसके उद्गम की तलाश नहीं करेगा। नाम बदलकर चोखामेला, हरिजन इत्यादि का कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि इसमें असली नाम के साथ जुड़े तिरस्कार तथा घृणा दूसरे नाम के साथ स्थानांतरित हो जाते हैं। जब तक आप हिन्दू धर्म में रहोगे आप को नाम बदलने ही पड़ेंगे। अपने आप को हिन्दू कहना पर्याप्त नहीं है। कोई भी स्वीकार नहीं करता कि कोई हिन्दू भी होता है। ऐसे ही अपने आप को केवल महार कहने से भी काम नहीं चलेगा। जैसे ही आप नाम उच्चारण करोगे कोई तुम्हारे पास भी नहीं आऐगा। आज एक नाम बदलने, कल दूसरा नाम और इस प्रकार एक घड़ी के पेंडुलम/ लोलक की स्थिति में बने रहने की बजाय मैं आप से कहता हूं कि आप स्थाई तौर पर अपना धर्म परिवर्तित कर अपना नाम भी क्यों न परिवर्तन कर लें।
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इस धर्म परिवर्तन आन्दोलन के शुरू होते ही बहुत से लोगों ने बहुत आपत्तियां उठाई हैं। आओ हम इन आपत्तियों में सत्यता की जांच करें। कुछ हिन्दू धार्मिक होने का बहाना करते हुए आपको उपदेश देते हैं कि धर्म कोई आनन्द लेने की वस्तु नहीं है। धर्म को हम पोशाक की तरह प्रतिदिन नहीं बदल सकते। आप हिन्दू धर्म को त्यागकर किसी और धर्म के अनुयायी बनना चाहते हो तो क्या आप ने कभी विचार किया है कि आपके पूर्वज जो इस धर्म से इतने लम्बे काल से जुड़े रहे, क्या वे पागल थे?’’ अपने आप को बुद्धिमान कहलाने वालों ने यह प्रश्न उठाया हैं पर मुझे इस आपत्ति में कोई सार नहीं लगता। कोई मूर्ख ही यह तर्क दे सकता है कि वह अपने धर्म से केवल इसलिए चिपका रहा क्योंकि यह धर्म उसके पूर्वजों का था। कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा तर्क नहीं दे सकता। वे जो यह कहते हैं कि पूर्वजों के धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, संभवतः उन्होंने कभी भी इतिहास का अध्ययन नहीं किया। चिरकाल में आर्यों का धर्म ‘वैदिक धर्म’’ था जिसमें मुख्यतया तीन लक्षण विशेषकर गोमांस का भक्षण, मद्यपान तथा मौज उड़ाना उस समय के धर्म के अंग थे। हजारों की संख्या में भारत में इस धर्म के अनुयायी थे तथा आज भी कुछ ब्राह्मण उसमें वापस जाने के स्वप्न देखते हैं। अगर पुरातन धर्म से ही जुड़े रहना था तो भारत में लोग हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध