29. 31.5.1936 मुक्ति का मार्ग क्या है? - Page 147

126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

धर्म के अनुयायी क्यों बने? वैदिक धर्म छोड़ जैन धर्म के अनुयायी क्यों बने? इस बात को नकार नहीं सकते कि हमारे पूर्वज प्राचीन धर्म के अनुयायी थे, परन्तु यह ज्ञात नहीं कि उस धर्म से क्या वे स्वयं इच्छा से जुड़े थे। इस देश में चर्तुवर्ण प्रणाली काफी लम्बी अवधि के लिए चली। इस प्रणाली में ब्राह्मण को शिक्षा का अधिकार, क्षत्रिय को युद्ध, वैश्य को व्यापार व संपदा तथा शूद्र को सेवा करने का के अधिकार उस काल के नियम थे। इस प्रथा के अन्तर्गत शूद्र को शिक्षा, अस्त्र तथा सम्पति अधिकार नहीं थे। आपके वे पूर्वज जिन्हें इस धर्म में निर्धन व निहत्थे बनाकर इस दशा में रहने को विवश किया गया, कोई भी सामान्य ज्ञान वाला व्यक्ति यह मानने को तैयार न होगा कि उन्होंने अपनी इच्छा से यह धर्म स्वीकार किया होगा। यहां यह समझना भी आवश्यक है कि क्या तुम्हारे पूर्वजों द्वारा इस धर्म व्यवस्था का विरोध करना सम्भव था। अगर उनके लिए विद्रोह करना सम्भव था और तब भी उन्होंने विद्रोह नहीं किया तभी हम यह कह सकते हैं कि यह धर्म उन्होंने स्वेच्छा से स्वीकार किया था। परन्तु यदि हम वास्तविक परिस्थितियों पर नजर डालें तो स्पष्ट तौर पर पायेंगे कि हमारे पूर्वजों को उस धर्म के बीच रहने को विवश किया गया था। अतः यह हिन्दू धर्म हमारे पूर्वजों का धर्म नहीं है, परन्तु यह दासता तो उन पर लादी गई थी। हमारे पूर्वजों के पास इस दासता के विरुद्ध लड़ाई लड़ने के साधन उपलब्ध न होने के कारण वे विद्रोह नहीं कर पाए। वे दबाव में इस धर्म में रखे गये। उनकी असहाय वाली स्थिति के प्रकाश में उनको दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यथार्थः कोई भी उन पर दया करेगा। परन्तु अब आज के युग की पौध को कोई भी किसी भी प्रकार की दासता में जबरन विवश कर नहीं रख सकता। उनको हर प्रकार की स्वतंत्रता प्राप्त है। इस स्वतंत्रता का लाभ उठाते हुए भी अगर ये स्वयं को मुक्त नहीं करते तो बड़े खेद से उनको इस धरती पर रहने वाला अति नीच, दासत्व प्रिय और परम्पराओं पर आश्रित कहा जाएगा।

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मनुष्य और पशु में अन्तर

हमें अपने धर्म से बांधा रहना चाहिए क्योंकि हमें यह हमारे पूर्वजों से मिला है, यह कथन किसी मूर्ख की ही वाणी हो सकती है। कोई समझदार व्यक्ति यह तर्क नहीं दे सकता। यह पशुओं के लिए एक उपयुक्त उपदेश है और किसी मनुष्य के लिए यह बात कि उन्हीं परिस्थितियों में रहता रहे जिनमें वह रहता रहा है कभी भी उपयुक्त नहीं। मनुष्य और पशु में यह अंतर है कि मनुष्य तो उन्नति कर सकता है परन्तु पशु नहीं कर सकता। धर्म परिवर्तन बदलाव का ही एक रूप है। परिवर्तन ही प्रगति का दूसरा नाम है। और यदि प्रगति धर्म परिवर्तन के बिना संभव नहीं है तो धर्म परिवर्तन आवश्यक है। एक प्रगतिशील मानव के मार्ग में पूर्वजों की देन धर्म कभी भी अड़चन पैदा नहीं कर सकता।