29. 31.5.1936 मुक्ति का मार्ग क्या है? - Page 148

127

धर्म परिवर्तन के विरोध में एक और तर्क दिया जा सकता है कि धर्म परिवर्तन को पलायनवाद की मनोवृत्ति कह सकते हैं। आज अनेक हिन्दू, ‘हिन्दू धर्म सुधार कार्य, करने पर तुले हैं। वे दावा करते है कि उनके प्रयास से अस्पृश्यता तथा जातिवाद का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा। इसलिए, इस मोड़ पर धर्म परिवर्तन उपयुक्त नहीं है। कोई इन हिन्दू समाज सुधारकों के बारे में कोई मत व्यक्त करे, निजी तौर पर उन से मेरी घृणा है। मुझे उनके बारे में बहुत अनुभव है और उन अर्ध-बुद्धिजीवियों से मुझे प्रबल अनिच्छा अनुभव होती है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि वे जो अपनी ही जाति में रहना चाहते हैं, अपनी ही जाति में ब्याह रचाना चाहते हैं और अपनी ही जाति में मरना चाहते हैं, अपने भ्रामक नारों, (’’जैसे कि वे जाति प्रथा को तोड़ने का विश्वास दिलाते हैं और किसी अछूत के विश्वास न करने पर वे नाराजगी जाहिर करते हैं,’’) के बल पर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं। जब मैं हिन्दू समाज सुधारकों के नारे सुनता हूं तो मुझे बरबस अमेरिकी नीग्रो (हब्शी) के बंधन मुक्ति के लिए अमेरिकी गोरों के प्रयासों का स्मरण हो जाता है। वर्षों पहले अमेरिकी नीग्रो की हालत भारत में अछूतों के जैसी ही थी। दोनों में अन्तर केवल इतना है कि हब्शियों की दासता को कानून की स्वीकृति थी जबकि आपकी दासता धर्म की एक उत्पत्ति है। कुछ अमेरिकी सुधारकों ने नीग्रो दास मुक्ति का बीड़ा उठाया हुआ था। लेकिन क्या हिन्दू समाज सुधारकों की तुलना अमेरिकी गोरे सुधारकों से की जा सकती है जिन्होंने नीग्रो को मुक्ति दिलाई? उन अमेरिकी गोरे समाज सुधारकों ने अपने निजी संबंधियों के विरुद्ध सशस्त्र सैन्य लड़ाईयां लड़ीं। उन्हांने हज़ारों गोरे अमेरिकियों को जान से मार दिया क्यांकि वे दास प्रथा जारी रखने के समर्थक थे और ऐसा करते हुए अमेरिकी गोरे सैनिकों ने भी अपने खून का बलिदान दिया। जब हम इन घटनाओं का वर्णन इतिहास के पृष्ठों में पढते हैं, तो हम यह कहने को विवश हो जाते हैं कि अमेरिकी समाज सुधारकों की तुलना में भारतीय सुधारक तो किसी गिनती में नहीं आते। ’’कहाँ राजा कहाँ पोतराजा’’ जिसको उत्तर भारत में ‘‘कहां राजा भोज कहां गंगू तेली’’ कहते हैं वाली लोकोक्ति लागू होती है। अपने आपको भारत के अछूतों के उपकारी कहने वाले सुधारकों से कोई पूछे कि क्या आप अपने ही हिन्दुओं व भाईयों के विरुद्ध गृह युद्ध लड़ने को तैयार हो जैसा अमेरिकी गोरों ने अपने ही गोरे भाईयों के विरुद्ध हब्शियों के निमित्त लड़ा था? अगर नहीं तो यह लम्बी चौड़ी सुधारों वाली बातों का क्या सार? अछूतों के निमित लड़ाई का दावा करने वाले हिन्दुओं में सबसे महान हिन्दू, महात्मा गांधी हैं। वे किस सीमा तक साथ दे सकते हैं। महात्मा गांधी जो ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध अहिंसात्मक आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, अछूतों के अत्याचारी हिन्दुओं के विरुद्ध बोलकर हिन्दुओं की भावनओं को आहत करने को भी तैयार नहीं है। वह उनके विरुद्ध सत्याग्रह आरम्भ करना नहीं चाहते। वे हिन्दुओं के विरुद्ध कानूनी लड़ाई