128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भी लड़ना नहीं चाहते। ऐसे सुधारकों से मुझे कुछ भला होते नहीं दिखता।
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दोष केवल छूत हिन्दुओं का ही है
कुछ हिन्दू अछूतों की सभा में उपस्थित होते हैं और सवर्ण हिन्दू जाति की निंदा करते हैं। कुछ मंच पर विराजमान होकर अछूतों को उपदेश देते हुए कहते हैं, ‘‘भाईयो, स्वच्छ रहो, शिक्षा ग्रहण करो, अपने पैरों पर खड़े हो, इत्यादि’’। वास्तव में अगर दोषारोपण करना है तो दोष केवल सवर्ण हिन्दुओं का है। ये सवर्ण हिन्दू ही गलत करते हैं। इस पर भी कोई इन सवर्ण हिन्दुओं को इक्ट्ठे कर इनकी भर्त्सना नहीं करता। वे लोग जो हिन्दुओं की सहायता से और हिन्दू धर्म में बने रहकर अछूतों को आन्दोलन जारी रखने का उपदेश देते हैं, को इतिहास की कुछ घटनाओं का स्मरण कराना चाहूंगा। पिछले विश्व युद्ध में एक अमेरिकी और ब्रिटिश गोरे सैनिक के बीच वार्ता का पढ़ा हुआ अंश स्मरण हो रहा है। इस क्षण मुझे वह एकदम उपयुक्त लग रहा है। उनके वार्ता का विषय था कि युद्ध कितना लम्बा चलना चाहिए। अमेरिकी के इस प्रश्न का उत्तर अंग्रेज ने बड़े गर्व से देते हुए कहा ‘‘जब तक अंतिम फ्रांसीसी नहीं मारा जाता हम यह युद्ध लड़ेंगे।’’ इसके विपरीत जब हिन्दू समाज सुधारक अछूतों के निमित्त अंत तक लड़ने का दावा करता है तो उसका अर्थ अंतिम अछूत के मारे जाने तक का होता है। उनके नारे की घोषणा का यही अर्थ मेरी समझ में आता है। आप के लिए यह निर्णय कठिन नहीं होना चाहिए कि जो केवल दूसरों के जीवन को दांव पर लगा कर युद्ध लड़ता है उसके जीतने की आषा नहीं होती। यदि हमें अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अपनी लड़ाई में स्वयं मरना है तो हमें गलत जगह से लड़ने का क्या लाभ? हिन्दू समाज को सुधारना न तो हमारा लक्ष्य है और न ही हमारा कार्यक्षेत्र। हमारा प्रयोजन तो अपनी मुक्ति पाना है। किसी और विषय से हमारा कुछ लेना देना नहीं है। अगर हमें धर्म परिवर्तन से मुक्ति मिल सकती है तो हम हिन्दू समाज को सुधारने का बोझा अपने कंधों पर लादने का दायित्व क्यों ले? और उसके लिए हम अपनी तेजस्विता, बल और धन का बलिदान क्यों दें? कोई भी हमारे इस आन्दोलन का गलत अर्थ ‘‘हिन्दू समाज के सुधार’’ से न जोड़े। हमारे आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य केवल अछूतों की सामाजिक स्वतंत्रता है और उतना ही सत्य है कि इस उद्देश्य की पूर्ति, धर्म परितर्वन के बिना संभव नहीं। मेरी दृष्टि में समता पाने के दो उपाय हैं। समता या तो हिन्दू धर्म के अनुयायी बने रहने से मिलेगी या दूसरे धर्म में परिवर्तन से मिलेगी। अगर हमें हिन्दू बने रहते समता प्राप्त करनी है तो केवल छूत बन जाने मात्र से समस्या हल नहीं होगी। समता तो केवल तभी आएगी, जब अंतर्जातीय भोजन, अंतर्जातीय वैवाहिक संबंध होंगे अर्थात् अछूतों के साथ रोटी व बेटी का रिश्ता होगा। इसका अर्थ यह है कि चतुर्वर्ण का उन्मूलन कर देना चाहिए