29. 31.5.1936 मुक्ति का मार्ग क्या है? - Page 150

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और ब्राह्मण धर्म को जड़ समेत उखाड़ फेकना चाहिए। क्या यह सम्भव है? और यदि सम्भव नहीं, तो क्या हिन्दू धर्म के बने रहते कभी समता के व्यवहार की आशा रखना बुद्धिमत्ता होगी? और क्या आप अपने प्रयासों में सफल हो पाओगे? तुलना करें तो धर्म परिवर्तन बहुत सुगम रहेगा। हिन्दू समाज मुस्लिमों को समानता देता है। हिन्दू समाज ईसाई को समानता देता है। प्रत्यक्ष धर्म परिवर्तन से सामाजिक समता, सुगमता से प्राप्त की जा सकती है। अगर यह सत्य है तो हम धर्म परिवर्तन का सरल रास्ता क्यों न अपनाऐं? मेरे मतानुसार इस धर्म परिवर्तन से अछूतों व हिन्दुओं दोनों को ही प्रसन्नता होगी। जब तक आप हिन्दू बने रहोगे जब तक आपको स्पर्ष से भ्रष्ट, भोजन और पानी तथा अंतर्जातीय विवाह जैसे विषयों पर संघर्षरत रहना पड़ेगा। और जब तक यह संघर्ष जारी रहेगा आप और हिन्दू एक दूसरे के लिए जन्म जब तक जन्मान्तर के शत्रु बने रहोगे। धर्म परिवर्तन से सब झगड़े जड़ से समाप्त हो जायेंगे। तब न तो आपको उनके मंदिरों पर दावे करने का अधिकार होगा और न ही उसकी आवश्यकता होगी। आपको सामाजिक अधिकारों जैसे अंतर्जातीय भोज, अंतर्जातीय विवाह इत्यादि की प्राप्ति के लिए संघर्ष की आवश्यकता ही नहीं होगी, तो झगड़े समाप्त हो जायेंंगे तथा एक दूसरे के प्रति प्यार और अच्छे संबंध होंगे। एक ओर हिन्दू तथा दूसरी ओर मुस्लिम और इसाईयों के संबंधों पर दृष्टिपात करें। मुस्लिमों तथा इसाईयों दोनों को हिन्दू अपने मंदिर में घुसने नहीं देते, ठीक वैसे ही जैसे आपको नहीं घुसने देते। उनके साथ भी अंतर्जातीय भोजन तथा वैवाहिक संबंध नहीं है। इसके प्रभाव से मुक्त उनके प्रति आकर्षण तथा सम्मान जो हिन्दुओं का उनके साथ है, वह आप और हिन्दुओं के बीच नहीं है। इसका मुख्य कारण है कि आप हिन्दूधर्मी हैं इसलिए हिन्दू समाज से सामाजिक और धार्मिक अधिकारों के झगड़े बने रहते हैं। परन्तु मुस्लिम और ईसाईयों के हिन्दू धर्म से बाहर होने के कारण उनको सामाजिक और धार्मिक अधिकारों की लड़ाई हिन्दुओं से नहीं लड़नी पड़ती। दूसरे उनके हिन्दू समाज में अंतर्जातीय विवाह व अंतर्जातीय भोज जैसे सामाजिक अधिकारों का कोई झगड़ा नहीं है, फिर भी हिन्दू उन्हें बराबरी का नहीं मानते। अतः, अगर धर्म परिवर्तन से समानता लाई जा सकती है तो हिन्दुओं तथा अछूतों में सद्भावना बनाई जा सकती है तो अछूत इस सुगम मार्ग को अपनी प्रसन्नता तथा समानता पाने के लिए क्यां न अपनाऐं? समस्या को इस कोण से देखते हुए, धर्म परिवर्तन ही आजादी का सही मार्ग है जिससे समता प्राप्त की जा सकती है। धर्म परिवर्तन पलायनवादी नहीं है और न ही यह कायरता का मार्ग, ये तो बुद्धिमत्ता का मार्ग हैं। धर्म परिवर्तन के विरोध में एक और तर्क दिया जाता है। कुछ हिन्दू कहते हैं कि अगर आप जाति प्रथा के विरुद्ध कुण्ठा से ग्रसित होकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रभावित होते हैं तो यह बेकार है। हिन्दू कहते हैं कि आप कहीं भी जाओ जातीयता तो मिलेगी ही। अगर आप एक मुस्लिम बनते हैं तो उसमें जातिवाद