130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है, अगर आप ईसाई बनते हैं तो उसमें भी जातिवाद है। दुर्भाग्यवश यह स्वीकार करना पड़ता है कि जातिप्रथा प्रणाली देश के दूसरें धर्मो में भी घुस गई है। परन्तु इस महा पाप की सिंचाई का दोष तो केवल हिन्दुओं पर ही है। इस रोग का स्त्रोत हिन्दू हैं और इसके बाद रोग ने दूसरों भी को ग्रस्त किया। उनके मत से वे असहाय थे। यद्यपि मुस्लिमों और ईसाईयों में भी जातियां हैं, परन्तु उसको हिन्दुओं के जातिवाद के बराबर ठहराना संकुचित मनोवृत्ति दर्शाएगा। हिन्दुओं की तुलना में मुस्लिमां और ईसाईयों में जाति प्रणाली के अंदर एक बहुत बड़ी भिन्नता है। प्रथम यह ध्यान देने योग्य है कि यद्यपि ईसाईयों और मुस्लिमों में जातिवाद है तथापि, कोई यह नहीं कह सकता कि यह उनकी सामाजिक प्रणाली की मुख्य विषेषता है। अगर कोई पूछता है कि ‘‘आप कौन हैं’’, उत्तर होगा- ‘‘मैं एक मुस्लिम हूं’’ या ’’मैं एक पारसी हूँ’’’। यह संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। किसी को आगे उसकी जाति पूछने की आवश्यकता नहीं होती। परन्तु यदि किसी हिन्दू से पूछा गया कि ‘‘आप कौन हैं?’’ और वो उत्तर दे, ‘‘मैं एक हिन्दू हूं’’। तो उसके इस उत्तर से संतुष्टि नहीं मिलती। उससे फिर पूछा जाता है कि तुम्हारी जाति क्या है? और बिना इसका उत्तर पाए उसके सामाजिक स्तर का अंदाजा नहीं लगता। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू धर्म में जाति का कितना अधिक महत्व है और उसकी तुलना में इस्लाम और ईसाईयों में यह एकदम नगण्य है। हिन्दुओं की तुलना में मुस्लिमों और ईसाईयों की जाति प्रणाली में एक और अंतर है। हिन्दुओं की जाति प्रणाली हिन्दू धर्म पर आधारित है जबकि इस्लाम और ईसाई धर्मो में जातियों को धर्म की स्वीकृति नहीं है। अगर हिन्दू जातिप्रथा को समाप्त करने की घोषणा करते हैं तो धर्म उनके आड़े आएगा। इसके विपरीत अगर मुस्लिम और ईसाई अपने समाज से जाति प्रथा को समाप्त करने के लिए आन्दोलन करना चाहें तो उनके धर्म इसमें आड़े नहीं आएंगे। बल्कि उनके धर्म कुछ सीमा तक इसका समर्थन करेंगे। यदि तर्क के लिए स्वीकार भी कर लें कि जातियां सब जगह हैं, तो भी यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हिन्दू ही बने रहना चाहिए। अगर जातिप्रथा बेकार है तो भी तर्कसंगत निष्कर्ष यह निकलता है कि हम ऐसा मार्ग अपनाएं जिसकी जातिप्रथा में कुछ लचीलापन हो तथा साधारण और सुगम तरीके से जाति प्रथा काउन्मूलन किया जा सके।
कुछ हिन्दू कहते हैं, ‘‘अकेले धर्म परिवर्तन से क्या होगा? अपना आर्थिक और शैक्षणिक स्तर सुधारने का प्रयास करो’’। इस उपदेश को सुनकर संभवतः हमारे कुछ लोग चकरा जाते हैं और इस प्रश्न का उत्तर देने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। इसलिए इसकी चर्चा करना मैं आवश्यक समझता हूं। पहला प्रश्न यह उठता है कि आपकी आर्थिक और शैक्षणिक अवस्था को कौन सुधारेगा? आप स्वयं या आपको यह तर्क देने वाले? मैं समझता हूं कि वे लोग आपसे कृत्रिम सहानुभूति दर्शाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करेंगे; न ही उनकी तरफ से इस दिशा में किए गए प्रयास देखने