29. 31.5.1936 मुक्ति का मार्ग क्या है? - Page 152

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में आए हैं। इसके विपरीत, प्रत्येक हिन्दू अपनी जाति का आर्थिक स्तर सुधारने का प्रयास करता है। उसका दृष्टिकोण अपनी जाति तक ही सीमित रहता है। ब्राह्मण स्त्रियों के लिए, ब्राह्मण विद्यार्थियों को छात्रवृतियां देने के लिए और बेरोजगार ब्राह्मणों को रोजगार दिलाने के लिए। सारस्वत (ब्राह्मणों की एक जाति) भी ऐसा ही कर रहे हैं। कायस्थ और मराठे यही कर रहे हैं। हर कोई अपना और अपनी जाति का उत्थान करने में लगा है और जिन्हें कोई कार्य नहीं मिलता वे ईश्वर की दया पर निर्भर हैं। आपको अपना उत्थान स्वयं करना है, कोई भी आपकी सहायता को आगे नहीं आएगा, यह ही हमारे समाज की वर्तमान दशा है। इस स्थिति में ऐसे लोगों का उपदेष सुनने का क्या औचित्य है? आपको भ्रमित करने और आपके समय का नाश करने के अतिरिक्त ऐसे उपदेश का कोई अन्य प्रयोजन नहीं है। अगर आपको अपने आपको स्वयं सुधारना है तो हिन्दू लोगों की बकवास सुनने की कोई आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें आपको उपदेश देने का कोई अधिकार है। यद्यपि इतना उत्तर पर्याप्त लगे तो भी मुझे अभी कुछ और कहना है। मैं इस तर्क का खण्डन करना आवश्यक समझता हूं।

मैं कुछ हिन्दुओं के ऐसे अटपटे प्रश्न से अचम्भित होता हूं कि केवल धर्म परितर्वन से क्या होगा? आज के बहुतायत सिक्ख, मुसलमान और ईसाई पहले हिन्दू थे और उनमें बहुत संख्या में शूद्र और अछूत थे। क्या ये आलोचक यह कहना चाहते हैं कि हिन्दू धर्म को छोड़ सिक्ख और ईसाई बनने वालां ने कोई उन्नति नहीं की? मगर यह सत्य नहीं है और यदि यह स्वीकारें कि धर्म परिवर्तन से इनकी दशा में निश्चित सुधार हुआ है, तो यह तर्क कि अछूतों को धर्म परिवर्तन से कोई लाभ नहीं होगा, का कोई अर्थ नहीं है, इस पर वे लोग विचार करें। इस वक्तव्य का अप्रत्यक्ष अर्थ लगता है, ‘‘धर्म परिवर्तन से कुछ न होने का अर्थ लगता है कि धर्म अर्थहीन है।’’ यह मेरी समझ से परे है कि जब धर्म अर्थहीन है, इससे कोई लाभ या हानि नहीं है तो वे अछूतों को हिन्दू धर्म में ही बने रहने का तर्क क्यां देते हैं? यदि उनको धर्म में कोई उपयुक्तता नहीं दिखती तो वे इस अनावश्यक तर्क में क्यों पडते हैं कि कौन से धर्म को अपनाया जाए और कौन से धर्म को छोड़ा जाए? वे हिन्दू जो पूछते हैं कि केवल धर्म परिवर्तन से क्या होगा, उन पर ऐसा ही एक प्रश्न दागा जा सकता है- केवल स्वराज से क्या प्राप्त किया जा सकता है। यदि यह सत्य है कि भारत के लोग अछूतों को चाहते हैं, आर्थिक और शैक्षणिक उन्नति की आवश्यकता अनुभव करते हैं तो स्वराज का क्या लाभ है। यदि केवल स्वराज से देश को लाभ मिलने वाला है तो निश्चय ही धर्म परिवर्तन से अछूतों को लाभ मिलेगा। इस समस्या पर गहन मंत्रणा के पश्चात हर कोई स्वीकार करेगा कि धर्म परिवर्तन अछूतों के लिए वैसे ही आवश्यक है जैसे स्वराज्य भारत के लिए। धर्म परिवर्तन अछूतों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है