138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भी दासता का होगा। अन्ततः आपके लिए यह कठिन काम है।
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यह विचार करते हुए कि इस अवसर पर मैं आपको क्या संदेश दूं, मुझे भगवान बुद्ध का संदेश जो उन्होंने अपने भिक्षु संघ को अपने महापरिनिर्वाण से ठीक पहले भेजा था का स्मरण किया। इसे महापरिनिब्बान सुता में उद्धश्त किया है।
एक बार भगवान बीमारी से स्वास्थ्य लाभ के बाद पेड़ के नीचे अपने आसन पर आराम कर रहे थे। उनका शिष्य पूज्यनीय आनन्द भगवान बुद्ध के पास गया और उनका अभिवादन कर उनके समीप बैठ गया और कहा कि ’’मैंने भगवान को बीमारी में और प्रसन्नता में देख लिया है। परन्तु भगवान की वर्तमान बीमारी से मेरा शरीर सीसे की भांति भारी हो गया है, मेरे मस्तिष्क में शांति नहीं है। मैं धम्म पर ध्यान नहीं लगा पा रहा हूं, लेकिन मुझे सांत्वना तथा संतुष्टि की अनुभूति हो रही है कि संघ को संदेश दिए बिना भगवान परिनिर्वाण नहीं पा सकेंगे और नहीं पाएंगे।
इस पर भगवान ने इस प्रकार उत्तर दिया ’’प्रिय आनन्द संघ मुझे से क्या आशा करता है? आनन्द, मैंने बिना कुछ छिपाए दिल खोलकर धम्म का उपदेश दिया। तथागत ने कुछ भी छिपाकर नहीं रखा जैसे कुछ दूसरे शिक्षक छिपाया करते हैं। प्रिय आनन्द। तथागत भिक्षु संघ को और क्या बता सकते हैं। आनन्द, सूर्य के समान स्वयं प्रज्वलित हो जाओ। जिस तरह धरती प्रकाश के लिए सूर्य पर निर्भर रहती है दूसरों पर आश्रित न रहो। स्वयं पर विश्वास करो, दूसरों पर निर्भर न रहो। सत्यवादी बनो, सदैव सत्य की शरण लो और किसी के आगे आत्मसमर्पण न करो।
मुझे भी बुद्ध के शब्दों को धारण करना हैं। ’’स्वयं का मार्गदर्शक बनो। अपने स्वयं के तर्क की शरण लो। दूसरों के उपदेश को सुनो दूसरों के सामने न झुको। सत्यवादी बनो। सत्य की शरण लो। कभी भी किसी के सामने आत्मसमर्पण न करो। अगर आप इस अवसर पर भगवान बुद्ध के इन संदेशों को स्मरण रखते हैं तो मुझे विश्वास है कि आपका फैसला कभी गलत नहीं होगा। ख्1,
1 जनता, 27 जून, 1936
(वसंत मून तथा संपादकों द्वारा अनूदित)