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...महारों और मांगों के बीच कोई भेद-भाव नहीं होगा
चुनावों के लिए उनकी पार्टी में शामिल होने पर उन्हें
आरक्षण दिलाने का वादा।
बंबई प्रेसीडेंसी मांग सम्मेलन मंगलवार 2 जून, 1936 को नैगाम, दादर में
आयोजित हुआ, इस सत्र में मांग समुदाय के लगभग 5,000 सदस्यों और प्रसीडेंसी
के विभिन्न जिलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
सर्वसम्मति से पारित मुख्य संकल्प यह था कि उपचार स्वतंत्रता और
समानता प्राप्त करने के लिए मांग समुदाय के पास धर्म परिवर्तन के अतिरिक्त और
कोई उपचार नहीं है। इस संकल्प में यह घोषणा भी की गई कि मांग समुदाय को
डॉ. बी. आर. अम्बेडकर में पूरा विश्वास है और धर्म परिवर्तन के उनके अभियान में
यह समुदाय सामूहिक रूप से उनके साथ है। समुदाय की स्थिति को सुधारने से
संबंधित अन्य संकल्पों को भी सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया।
विशेष आमंत्रण पर उपस्थित डॉ. अम्बेडकर ने लगभग एक घंटे तक सम्मेलन
को संबोधित किया। प्रारंभ में ही उन्होंने उल्लेख किया कि मांग समुदाय द्वारा धर्म
परिवर्तन के विषय पर उनके निर्णय की घोषणा करने के पश्चात ही उन्होंने इस
समय को भाषण देने के लिए चुना है क्योंकि विषेष रूप से वह यह नहीं चाहते थे
कि वह उनके निर्णय को थोड़ा सा भी प्रभावित करें। उन्होंने कहा कि जाति रूपी
बुराई स्वयं दलित वर्गों के बीच भी विद्यमान है।
हिंदूवाद पर दोषारोपण
उन्होंने कहा कि इस बुराई के लिए दलित वर्ग जिम्मेदार नहीं है। हिंदूवाद
इसके लिए दोषी है। मांग समुदाय जाति व्यवस्था के दुष्प्रभावों से बाहर निकलना
चाहता था इसीलिए वह इस धर्म से बाहर आने को मजबूर था। उन्होंने मांग समुदाय
को आश्वासन दिया कि यदि वे महार समुदाय के साथ आना चाहें तो उन्हें महार
समुदाय का ही सदस्य माना जाएगा जोकि बंबई प्रेसीडेंसी प्रांत में दलित वर्गों का