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‘‘डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा मंगलवार, 16 जून, 1936 की रात को दामोदर ठाकरसे हाल, बंबई में हुई एक बैठक में दलित वर्गों के कुछ निश्चित उपवर्गों के बीच चल रही बुराइयों, रीतियों पुराने रीतियों को समाप्त करने की जोशीली अपील की गई।
इस बैठक में देवदासी, पोटराजे, भूते, अराधी और जोगतिनी संप्रदायों के पुरुष और महिलाएं भारी संख्या में उपस्थित हुए और इसका आयोजन येवाला में प्रारंभ किए गए सामूहिक धर्मांतरण अभियान को समर्थन देने के लिए किया गया था।
पुरुषों और महिलाओं, दोनों में से, अनेक वक्ताओं द्वारा जनसमूह को सामाजिक स्वतंत्रता की दिशा में एक कदम के रूप में धर्म परिवर्तन की आवश्यकता पर संबोधित कर चुकने के पश्चात, डॉ. अम्बेडकर ने विशेष रूप से महिलाओं, जिनमें अधिकांशतः कमारीपुरा से आईं थीं, से एक जोशीली अपील की।
डॉ. अम्बेडकर ने कहा,
‘‘आप हमारे साथ धर्म परिवर्तन कर रहे हां अथवा नहीं, इस बात का मेरे लिए बहुत अधिक महत्व नहीं है। लेकिन मैं आग्रह करता हूं यदि आप हमारे साथ आना चाहते हैं तो आपको अपना शर्मनाक जीवन छोड़ना ही होगा। कमारीपुरा की महार महिलाएं, समुदाय के लिए शर्म है। जब तक आप अपनी जीवनशैली बदलने के लिए तैयार नहीं होते, हमें आपसे कुछ लेना-देना नहीं है, और हम आपके किसी काम के नहीं हैं।
‘‘आपके लिए केवल दो रास्ते हैंः या तो आप वहीं रहें जहां आप हैं और तिरस्कृत होती रहें तथा सबसे बची रहें, या फिर आप अपना शर्मनाक व्यवसाय छोड़ दें और हमारे साथ आ जाएं।
आप मुझसे पूछेंगी कि आप अपनी जीविकोपार्जन कैसे करेंगी। मैं आपको इस संबंध में कुछ बताने नहीं जा रहा हूं। इसके सैकड़ों तरीके हैं। लेकिन मैं आग्रह करता हूं कि आप यह निम्नकोटि का जीवन छोड़ दें। आपको अन्य वर्गों की महिलाओं के समान ही विवाह करके सामान्य घरेलू जीवन व्यतीत करना चाहिए और उन स्थितियों में नहीं रहना चाहिए जो अपरिहार्य रूप से आपको वेश्यावृति में खींच ले जाती हैं।’’ ख्1,
1 द टाइम्स ऑफ इंडिया, 17 जून, 1936