32. 8.11.1936 किसी षड्यंत्र का शिकार न बनें। - Page 166

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लेकिन जिन्होंने तथाकथित नेशनलिस्ट हरिजन पार्टी की स्थापना की है, उन्होंने मेरे विरुद्ध यह आरोप लगाया है और इस मुद्दे को तूल दिया है। इस आरोप का

खंडन किया जाना है और उन्हें एक उपयुक्त जवाब भी दिया जाना है। मैंने इन तथाकथित नेशनलिस्ट ‘हरिजनों’ के संगठन के लिए एक नाम चुना है। मैं उन्हें ‘ले भग्गू’ उठाइगीर अथवा सामान उठाकर भागने वाले चोर कहता हूं।

मैंने विशेष रूप से किसी के चमार जाति का सदस्य होने के कारण उसे पार्टी से निकाला अथवा अलग नहीं किया है। वे जो भी सोचना चाहते हैं वैसा सोचने के लिए स्वतंत्र हैं। इस बात से मुझ पर कोई बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है। इन ‘हरिजनों’ को आने वाले विधान सभा चुनाव में उम्मीदवार के रूप में न चुनने के कारणों में मुख्यतः इन लोगों की ‘उठाने और भाग जाने’ की आदत थी जो उन्हें शामिल न किए जाने की उत्तरदायी है। वे भीख मांगने के लिए भिखारियों की तरह कहीं भी जा सकते हैं। उनके मन में सिद्धांतों, पार्टी के अनुशासन और विचारधाराओं के लिए कोई सम्मान नहीं है। ‘छीनना’, ‘अपने कब्जे में करना’ और ‘ले भागना’ के सिद्धांत के साथ वे जैसे भी अपनी जीवनचर्या चला सकते हैं वही उनका एकमात्र सिद्धांत है।

हमने महाड सत्याग्रह प्रारंभ किया था। हमने आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता के लिए यह आंदोलन प्रारंभ किया था। हमने नासिक में एक और संघर्ष भी प्रारंभ किया था। बहुत पहले की बात नहीं है, पूना समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने के पहले, जिसने हमारे जीवन को असमंजस में डाल दिया था, हमने अपने अधिकारों और राजनैतिक सुरक्षा के लिए गांधी के विरुद्ध लड़ाई भी लड़ी थी। ये तथाकथित ‘राष्ट्रवादी हरिजन’ आराम से हमारे दुश्मनों के शिविरों में जा बैठे। अब यदि ये धोखेबाज हमारी सफलता, जिसके लिए उन्होंने न तो कोई संघर्ष किया और न ही हमारे साथ कोई सहयोग किया, में हिस्सा चाहते हैं तो हमें ऐसे लोगों के प्रति अब दया क्यों दिखानी चाहिए? मैं ऐसे लोगों की आलोचना की कोई परवाह नहीं करता जिन्होंने चमगादड़ों के समान जीवन बिताने को चुना है। यही नहीं, पूना समझौते के पहले जब गांधीजी ने अपने जीवन को जोखिम में डाल दिया था, उस समय यही लोग थे जो गांधीजी के पक्ष के समर्थन में उठ खड़े हुए और यह घोषित किया कि वे गांधीजी के जीवन को बचाने के लिए दलित वर्गों के लिए सीटों का कोई आरक्षण नहीं चाहते। इसके पश्चात इन लोगों को उन सीटों में हिस्सा मांगने का क्या हक है जो हमने अपने संघर्ष के माध्यम से जीती हैं। इन तथाकथित राष्ट्रीय हरिजनों के मुख्य नेता श्री नारायण काजरोलकर एक दिन डॉ. सावरकर की श्रेणी में बैठे हुए पाए जाएंगे। श्री पी. बालू, श्री बल्लभभाई पटेल जैसे ‘देशभक्तों’ के शिविर में एक सीट के लिए संघर्ष करते हुए मिलेंगे।