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माह नवंबर 1937 के लिए निरोप्या, भाग XXII, संख्या 6 में प्रकाशित होने वाले ‘‘डॉ. अम्बेडकर आनी धर्मांतारची आवश्यकता’’ (अर्थात डॉ. अम्बेडकर और धर्मांतरण की आवश्यकता) शीर्षक वाली संपादकीय टिप्पणी का पूरा अनुवाद।
(इस पूरे अनुवाद के दौरान कोष्ठकों में आने वाले हिस्से मूल पाठ में नहीं आते हैं केवल उन स्थितियों को छोड़कर जहां कि हाशिए में ऐसा अन्यथा उल्लेख किया गया हो),
साप्ताहिक समाचार-पत्र जनता से ऐसा ज्ञात हुआ है कि डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में 28 अगस्त, 1937 को म्युनिसिपल हाल, बांद्रा में दलित वर्गों की एक बड़ी सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया और उसमें निम्नलिखित संकल्प पारित किया गयाः-
‘‘जैसाकि बंबई प्रेसीडेंसी महार सम्मेलन में संकल्प किया गया था हमारे भाइयों और बहनों को हिंदू धार्मिक त्योहारों, हिंदूवाद की धार्मिक रीतियों जैसे शपथ इत्यादि, और धार्मिक प्रक्रियाओं जैसे व्रत का पालन नहीं करना चाहिए।’’
इस अवसर पर अनेक भाषणों के संपन्न हो जाने के पश्चात डॉ. अंबेडकर बोलने के लिए खड़े हुए।
उन्होंने कहाः ‘‘हमारी सभा विशेष रूप से आपको बंबई महा प्रांत महार सम्मेलन द्वारा धर्मांतरण के संबंध में पारित किए गए संकल्पों को याद दिलाने के लिए बुलाई गई है। इसलिए यदि किसी को धर्मांतरण के संबंध में कोई प्रश्न पूछना है तो वह निश्चित रूप से पूछ सकता है।’’ जब किसी भी व्यक्ति ने कोई प्रश्न नहीं पूछा तो डॉ. अम्बेडकर ने अपना भाषण प्रारंभ किया।
उन्होंने कहाः
‘‘प्रिय भाइयों और बहनों,
मैं इस सभा में शामिल नहीं हो रहा था; लेकिन मुझे पता चला कि कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जो अपनी पुरानी परंपराओं से जुड़े हुए हैं और ‘महार सम्मेलन’ द्वारा पारित किए गए धर्मांतरण संबंधी संकल्प को पूर्णतः नहीं अपना रहे हैं। इसलिए मैं ऐसे व्यक्तियों के संदेह दूर करने के लिए यहां आया हूं। मैं पहले भी (इस विषय पर) अपने विचार व्यक्त कर चुका हूं। वस्तुतः आपको उनके संबंध में अपने दिमाग