152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
में कोई संदेह नहीं पनपने देना चाहिए। वर्ष 1935 में आयोजित बंबई महा प्रांत महार
सम्मेलन, महार समुदाय के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने के उपयुक्त है।
इसलिए ऐसे किसी सम्मेलन द्वारा पारित किए गए संकल्पों को वस्तुतः महार समुदाय
द्वारा समग्र रूप से माना जाना चाहिए और महार समुदाय के अधिसंख्य सदस्यों को
इन संकल्पों के लिए कार्य करना चाहिए।
हिंदू धर्म के देवताओं की पूजा नहीं की जानी चाहिए
डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा, ‘‘हमें ऐसे सभी धार्मिक त्योहार और दिवस
(मनाने) छोड़ देने चाहिए जो हम हिंदू धर्म के अनुसार मनाते रहे हैं। हमको इस बात
पर विचार करना चाहिए कि क्या हिंदू धर्म के अनुसार किए जाने वाली रीतियां धर्म
और नैतिकता के दृष्टिकोण से उचित हैं। कुछ रीतियां आत्यंतिक अश्लीलता से पूर्ण
है। उदाहरण के लिए अनेक व्यक्ति सोमवार को (भगवान) शंकर के नाम पर व्रत
रखते हैं और अनेक प्रकार से भगवान शंकर की पिंडी (लिंग) को पूजते हैं। लेकिन
क्या किसी ने इस बात पर विचार किया है कि शंकर की पिंडी है क्या? ये पुरुष
और महिला के मिलन के प्रतीक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। क्या हमें इस प्रकार
के किसी अभद्र प्रतीक की प्रशंसा करनी चाहिए? यदि पुरुष और महिला सड़कों पर
कुत्तों के समान अभद्र व्यवहार में शामिल हो जाएं, तो क्या हमें उन्हें फूलों के साथ
पूजना चाहिए अथवा जूतों के साथ? तो क्या हमें पार्वती (और) शंकर के इसी प्रकार
के कार्य के प्रतीक अर्थात भगवान की अभद्रता की पूजा करनी चाहिए?’’
‘‘गणपति के साथ भी कुछ ऐसा ही है।’’ डॉ. अंबेडकर ने आगे कहाः ‘‘गण्
ापति की कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक बार पार्वती नग्न रूप में स्नान कर रही
थीं, उस समय शंकर कहीं और गए हुए थे। तब कोई उनके कार्य में व्यवधान न
डॉले, इसलिए पार्वती ने अपने शरीर के मैल को खुरचा और उसमें से गणपति यानी
रक्षक का निर्माण किया। अब इस स्थिति में शरीर के मैल से बने इस देवता को
क्या भगवान माना जाना चाहिए? भगवान को साफ और पवित्र छवि वाला अवतार
होना चाहिए, लेकिन हिंदू धर्म में जैसाकि मैं अभी आपको बता रहा हूं भगवान बहुत
विचित्र प्रकार के हैं। इसलिए मेरा ईमानदारी के साथ यह मानना है कि उनकी पूजा
नहीं की जानी चाहिए।’’
तीसरे, डॉ. अम्बेडकर ने दत्तात्रेय की कहानी का संदर्भ लिया, ‘‘नारद तीन
देवताओं ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पत्नियों को यह बताया करता या कि महर्षि
अत्रि की पत्नी अनुसूइया बहुत ही पतिव्रता पत्नी थी। वे इस बात को सहन नहीं
कर सकीं कि किसी महिला को उनसे अधिक पतिव्रता माना जाए। इसलिए इन
तीनों पत्नियों ने अपने-अपने पतियों से अनुसूइया के पातिव्रत्य को भंग करने के