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लिए कहा और उन तीनों नायकों ने अपनी-अपनी पत्नियों की बात सुनी और ऐसा
करने के लिए राजी हो गए। ये तीनों व्यक्ति अनुसूइया के घर गए, उसके पति को
किसी बहाने कहीं और भेज दिया और अनुसूइया के साथ रहने लगे। इस स्थिति
में उसने एक पुत्र को जन्म दिया और चूंकि उस बच्चे के पिता को लेकर संदेह था
इसलिए उसके तीन सिर लगा दिए गए ताकि इन तीनों (भगवानों) पर बराबर-बराबर
जिम्मेदारी आए और यही दत्तात्रेय का अवतार है।’’
अपने भाषण की समाप्ति पर डॉ. अंबेडकर ने कहा, ‘‘अनेक लोगों का यह
मानना है कि धर्मांतरण की लहर अब शांत हो चुकी है। लेकिन ऐसा नहीं है। धर्मांतरण
तो होना ही है। अपने मस्तिष्क में इस बात को अच्छी तरह से बैठा लीजिए कि मैंने
यह आंदोलन छोड़ा नहीं है। अनेक हिंदुओं ने मुझसे कहा है कि ‘धर्मांतरण संबंधी
आपके आंदोलन के परिणामस्वरूप हमारी आंखे खुल गई हैं। अब चूंकि हम लोग
जाग चुके हैं अतः हमें आपकी तरफ अपने कर्त्तव्य में असफल नहीं होना चाहिए;
जिससे कि आपको धर्मांतरण संबंधी अपने आंदोलन को वापस लेना पड़े। लेकिन
मैंने अब तक जो अनेक कारण बताए हैं उनके चलते मेरी इस आंदोलन को वापस
लेने की मंशा नहीं है। इस मामले पर पूरी तरह से विचार करें और अपनाए जाने
वाले नए (अन्य) धर्म को अच्छी तरह से जांचपरख कर (जैसाकि सोने के मामले में
उसे तपाया और जांचा जाता है) ही अपनाया जाए। मुझे आशा है कि इसके पश्चात
महार समुदाय के सभी सदस्य उसी प्रकार से कार्य करेंगे जैसाकि महार समुदाय
के सम्मेलन में निर्णय किया गया था।’ ख्1,,
1 स्टेशन डायरी का सार भोइवाड़ा पुलिस स्टेशन, बृहस्पतिवार, दिनांक 27 मई, 1937, 12-10 प्रातः
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का यह भाषण और संकल्प, जनता, दिनांक 4 सितम्बर, 1937 के अंक में प्रकाशित किए
गए थे - संपादक