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सुरक्षा अथवा उसमें पदोन्नति पाने के लिए उसके पास कौन सी संभावना है। यह एक अभिशाप है कि दलित वर्ग का कामगार इस कारण कई उप-व्यवसायों से वंचित है क्योंकि वह एक अछूत है। कपास उद्योग इसका एक अभिशप्त उदाहरण है। मैं यह नहीं जानता कि भारत के अन्य भागों में क्या होता है। लेकिन मैं यह जानता हूं कि बंबई प्रेसीडेंसी में दलित वर्गों के लिए बंबई और अहमदाबाद--दोनों जगह कपास मिलों में बुनाई विभाग वर्जित है। वे केवल कताई विभाग में काम कर सकते हैं। कताई विभाग एक ऐसा विभाग है जिसमें सबसे कम पगार मिलती है। बुनाई विभाग से उन्हें वर्जित रखे जाने का कारण यह है कि वे अछूत हैं और इस कारण सवर्ण हिंदू कामगार उनके साथ काम करने में आपत्ति उठाते हैं, हालांकि उन्हें मुसलमानों के साथ काम करने में कोई परहेज नहीं होता।
रेलवे का उदाहरण लीजिए। रेलवे में दलित वर्ग के कामगार की क्या स्थिति है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उसका भाग्य एक गैंगमैन के रूप में काम करने तक है। हर रोज, सारे जीवन भर वह एक गैंगमैन के रूप में कार्य करता है जिसमें उन्नति की कोई संभावना नहीं होती। उच्चतर श्रेणी का कोई ऐसा पद नहीं होता जिस पर वह जा सके। बहुत ही विरल मामलों में ही उसे पोर्टर (कुली) के रूप में रखा जाता है। यह इस कारण है क्यांकि एक पोर्टर के रूप में भी उसे स्टेशन मास्टर के परिवार में अपने नियमित कर्तव्यों के एक अंग के रूप में घरेलू नौकर की तरह काम करना होता है। एक दलित वर्ग का कामगार स्टेशन मास्टर के लिए, जो आमतौर पर उच्च जाति का हिंदू होता है, अनुपयोगी रहता है क्योंकि वह, यदि पार्टर अछूत हो तो, अपने घरेलू कामकाज के लिए पोर्टर की सेवाओं का लाभ नहीं उठा सकता। इसलिए वह आमतौर पर पोर्टर के रूप में किसी दलित वर्ग के व्यक्ति को नियुक्त करने से कतराता है। रेलवे में क्लर्कों की नियुक्ति के लिए कोई अर्हक परीक्षा नहीं है और इन पदों पर अक्सर गैर-मैट्रिक लोगों की नियुक्ति कर ली जाती है। रेलवे में भारतीय ईसाइयों, एंग्लो इंडियनों और सवर्ण हिंदुओं में से सैकड़ों गैर-मैट्रिक क्लर्कों के रूप में भर्ती किए जाते हैं। लेकिन दलित वर्ग के जो लड़के गैर-मैट्रिक होते हैं और जिनकी संख्या सैकड़ों में होती है, उन्हें इरादतन वंचित रखा जाता है और शायद ही कभी किसी को मौका मिलता हो। रेलवे वर्कशाप में भी यही स्थिति है। बहुत ही विरल मामलों में दलित वर्ग के किसी व्यक्ति को मैकेनिक क्लास के रूप में रोजगार पर रखा जाता है। शायद ही कोई ऐसा दलित व्यक्ति होता हो जिसे मिस्त्री का पद धारण करने का मौका मिलता हो। उसे वर्कशाप में फोरमैन और यहां तक कि चार्जमैन भी कभी बनने नहीं दिया जाता। वह केवल कुली होता है और कुली बना रहता है। रेलवे में दलित वर्ग के