170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कामगारों की स्थिति ऐसी ही है।
जिन उपव्यवसायों में उसे काम करने का मौका लगता है, उनमें उसे सबसे निचले ग्रेड पर रखा जाता है। उसे शक्ति अथवा अधिकारों के किसी भी पद से वंचित रखा जाता है। केवल यही नहीं कि उसे सबसे निचले ग्रेड पर रखा जाता है बल्कि उसके सेवानिवृत्त होने तक वह उसी ग्रेड में बना रहता है। उसके लिए प्रोन्नति का कोई मौका नहीं होता। उसके लिए कोई जीवनवृत्ति नहीं होती और अक्सर पदोन्नति का कोई मौका नहीं होता। उसके साथ ऐसा तब होता है जब कोई मंदी की स्थिति नहीं होती। मंदी के दौरान सबसे पहले उसे नौकरी से निकाला जाता है और गरमबाजारी के दौरान उसे सबसे आखिर में नौकरी पर रखा जाता है।
जिन आलोचकों ने मुझ पर और आप पर अहितकारी मंशा का दोष लगाया है मैं उनसे दो प्रश्न पूछना चाहूंगा। ये दो बहुत सीधे से प्रश्न हैं--क्या ये वास्तविक शिकायतें नहीं हैं? दूसरे, यदि ये वास्तविक शिकायतें हैं तो क्या जो लोग इनसे पीडि़त हैं उन्हें इन शिकायतों के निवारण के लिए एकजुट नहीं होना चाहिए? यदि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर हां में है तो मैं यह नहीं समझता कि कोई भी ईमानदार आदमी कोई और उत्तर कैसे दे सकता है? इसका अर्थ हुआ कि हमारी कोशिश सर्वथा उचित है। जो श्रमिक नेता हमारे ऊपर दोषारोपण कर रहे हैं, वे निश्चय ही किसी भ्रांति की जकड़ में है। उन्होंने कार्ल मार्क्स में यह पढ़ा है कि केवल दो वर्ग हो सकते हैं, मालिक और कामगार तथा मार्क्स को पढ़ लेने के बाद वे सीधे यह मानकर चलते हैं कि भारत में केवल मालिक और कामगार हैं और इसके बाद वे पूंजीवाद को ध्वस्त करने के अपने मिशन में चल पड़ते हैं। इस संबंध में निश्चय ही दो गलतियां हैं। पहली गलती उस वास्तविक सोचने में है जोकि मात्र संभव या आदर्श है। मार्क्स ने एक सिद्धांत के रूप में यह कभी नहीं कहा कि किसी भी समाज में स्पष्टतः दो वर्ग अर्थात मालिक और कामगार हैं। सच तो यह है कि इस तरह का कथन गलत है और इसलिए इसे ऐसी बुनियाद के रूप में मान लेना खतरनाक है जिसके ऊपर कोई सक्रिय प्रचार किया जा सकता है जिसमें सफलता प्राप्त हो सके। यह मानना भी उतना ही गलत होगा कि कोई आर्थिक व्यक्ति अथवा विवेकपूर्ण व्यक्ति अथवा जिम्मेदार व्यक्ति एक ऐसी सच्चाई है जो सभी वर्गों में मौजूद है। जब कभी अर्थशास्त्री आर्थिक व्यक्ति को एक बुनियादी तथ्य के रूप में रखता है तो वह सदैव सचेत रहने की बात कहता है--कि आर्थिक व्यक्ति केवल तभी मौजूद है जबकि अन्य बातें समान हैं। श्रमिक नेता अन्य बातें बराबर होने को भूल गए हैं। यह मानना गलत होगा कि यहां तक यूरोप में, मार्क्स ने जो कहा वह सच है। ‘क्या जर्मनी में कोई व्यक्ति गरीब और उत्पीडि़त है? क्या फ्रांस में कोई लुटा हुआ