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तथा बर्बाद दस्तकार हैं? वहां वे एक ही जाति, एक ही देश, एक ही प्रजाति, एक ही अतीत, एक ही वर्तमान और एक ही भविष्य के साथ जुड़े हुए हैं। उन्हें संगठित होने दें’। यह एक ऐसा उद्देश्य है जिसे मार्क्स के समय से बराबर दिया जाता रहा है। क्या जर्मनी के गरीब और उत्पीडि़त व्यक्ति फ्रांस के लुटे हुए और बर्बाद दस्तकार के साथ संगठित हुआ है? 100 वर्षों के बाद भी उन्हें संगठित होना नहीं आया और अपनी अंतिम लड़ाई में वे मुक्त प्रतिबद्ध और निष्ठुर विरोधियों की तरह लड़े थे। भारत के मामले में इस तरह की बात निश्चय ही दोषपूर्ण होगी। भारत में एक सुस्पष्ट विभाजन मौजूद नहीं है। यह कि सभी मजदूर एक हैं, एक ही वर्ग का हिस्सा हैं एक ऐसा आदर्श है जिसे प्राप्त किया जाना है और इसे सच मानना सबसे बड़ी गलती है। मजदूरों की श्रेणियों को हम कैसे समेकित कर सकते हैं? मजदूरों के बीच हम एकता कैसे ला सकते हैं? हम यह काम मजदूरों के एक वर्ग को मजदूरों के दूसरे वर्ग को दबाने की अनुमति देकर नहीं कर सकते। यह काम हम उत्पीडि़त वर्ग को संगठित होने से रोककर नहीं कर सकते। हम यह काम मजदूरों के उस क्षुद्र वर्ग को, उसके साथ हो रहे अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने से रोक कर नहीं कर सकते। एकता लाने का वास्तविक तरीका यह है कि उन कारणों का उन्मूलन किया जाए जो एक कामगार को जाति और धर्म के आधार पर दूसरे कामगार का विरोधी बनाते हैं। एकता लाने का असली तरीका यह है कि कामगार को यह बताया जाए कि जो अधिकार वह दूसरे कामगारों को देने को तैयार नहीं हैं उन अधिकारों का दावा करना उसके लिए गलत है। एकता लाने का असली तरीका यह है कि जो कामगार इस तरह का भेदभाव करता है जिस कारण अनावश्यक भेदभाव पनपता है वह सिद्धांत रूप में गलत है तथा कामगारों की एकता के लिए भयावह है। दूसरे शब्दों में यदि हम श्रमिकों की श्रेणियों को संगठित करना चाहते हैं तो हमें कामगारों के बीच ब्राह्मणवाद को-असमानता की इस भावना का उन्मूलन करना है लेकिन ऐसा मजदूर नेता कौन है जिसने कामगारों के बीच इस दिशा में काम किया हो? मैंने मजदूर नेताओं को पूंजीवाद के विरुद्ध भड़काऊ तरीके से बोलते हुए सुना है। लेकिन मैंने किसी भी मजदूर नेता को कामगारों के बीच ब्राह्मणवाद के विरुद्ध बोलते हुए नहीं सुना। दूसरे शब्दों में इस मामले में उनकी चुप्पी सर्वथा सुस्पष्ट है। क्या उनकी यह चुप्पी इस विश्वास पर आधारित है कि कामगारों के संगठन और एकता के साथ ब्राह्मणवाद का कोई लेना-देना नहीं है, वे इस तथ्य को स्वीकार नहीं करते कि श्रमिकों के बीच विघटन के बीच ब्राह्मणवाद का बहुत गहरा संबंध है अथवा क्या यह मात्र अवसरवाद है जो श्रमिकों का नेतृत्व प्राप्त करने और ऐसी कोई बात न कहने में विश्वास रखता हो, जो कामगारों की भावना को ठेस पहुंचाती हो। मैं इस बात का पता लगाने के लिए रुकना नहीं चाहूंगा। लेकिन मैं यह अवश्य कहूंगा कि यदि श्रमिकों के संगठन के पीछे ब्राह्मणवाद को मूल कारण माना जाता