172 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है तो कामगारों के बीच से इसके उन्मूलन की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए। मात्र अनदेखी करके अथवा चुप्पी साधकार इस संक्रमण से मुक्ति मिलने वाली नहीं है। यह जरूरी है कि इसका पीछा किया जाए, इसको उखाड़ फेंका जाए और इसका उन्मूलन किया जाए। केवल ऐसा होने के बाद ही कामगारों के बीच एकता बनी रह सकती है।
जब तक ब्राह्मणवाद एक जीवित शक्ति के रूप में बना रहेगा और जब तक लोग इस कारण इससे चिपके रहेंगे कि यह एक वर्ग को विशेषाधिकार देता है और दूसरे के लिए बाधाएं प्रस्तुत करता है, मैं समझता हूं कि तब तक उन लोगों के लिए जो इन बाधाओं में जकड़े हुए हैं, अपने आपको संगठित करने की जरूरत रहेगी। यदि वे आपस में संगठित होते हैं तो क्या नुकसान है? मैं शिकायत की गंभीरता स्वीकार करता यदि इस तरह के संगठन का निर्माण नियोक्ताओं द्वारा किया गया होता। यह उस स्थिति में सिद्ध किया जा सकता था कि हम नियोक्ताओं के साधन हैं, कि हम उनके हाथों में खेल रहे हैं, कि हम श्रमिकों के बीच फूट डालने के विशिष्ट प्रयोजन से अलग से संगठित हो रहे हैं तो उस स्थिति में इस सम्मेलन को निंदित करने का पर्याप्त औचित्य होता। निश्चय ही इस तरह के आचरण को धोखेबाजी कहा जा सकता था। लेकिन क्या कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि हमारी यह कार्रवाई नियोक्ताओं का काम है और यह कि हम यहां नियोक्ताओं की मदद करने और मजदूरों को नष्ट करने के लिए आए हैं? मैं अपने आलोचकों को ऐसा करने के लिए चुनौती देता हूं।
इसलिए यह सम्मेलन आयोजित करने के लिए किसी तरह की शर्मसारी अथवा कोई माफी मांगने की जरूरत नहीं है। सम्मेलन आयोजित करने के कारण और उद्देश्य पर्याप्त रूप से इसका औचित्य सिद्ध करते हैं। दलित वर्गों में केवल एक अथवा दो व्यक्ति हैं जिन्होंने इस सम्मेलन को नामंजूर किया है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इनमें से कुछ दूसरों के साधन और किराए के टट्टू हैं, कुछ भ्रमित हैं। दलित वर्ग अपने आपमें इतने कमजोर हैं और एकता शब्द में विशेष रूप से इतना आकर्षण है क्योंकि प्रभावी प्रचारकों के होठों से निकलकर आया हैं। अतः इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होता कि उनके साथ धोखा हुआ है लेकिन इस तरह के लोग यह भूल जाते हैं कि ऐसे पक्षकारों के बीच जिनकी भावनाएं और प्रवृत्तियां हर दृष्टि से एक-दूसरे के विरुद्ध हैं और जहां एक पक्ष ऐसे अधिकारों और हितों का दावा करता है जोकि दूसरों के हितों के प्रतिकूल है, पक्षकारों के बीच वास्तविक एकता कभी नहीं हो सकती। इस तरह के लोगों के बीच एकता कमजोर और उत्पीडि़त पक्ष के बीच धोखे से बढ़कर कुछ नहीं हो सकती। ऐसा हर निष्ठावान व्यक्ति जो इस तरह के