44. 13.2.1938 ट्रेड यूनियनों को अपने हितों की रक्षा के लिए राजनीति में प्रवेश करना चाहिए। - Page 194

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धोखे का परित्याग करता है, इन धोखेबाजों द्वारा इसी तरह निंदित है जैसेकि कोई व्यक्ति विभाजन के बीज बोता है। निश्चय ही विभाजन। हां यह विभाजन हो सकता है, लेकिन ऐसा विभाजन जिसमें एक वास्तविक अंतर और एक वास्तविक विरोध मौजूद हैं। यह विरोध मुख्यतः इसलिए पैदा होता है क्योंकि मजदूरों का एक वर्ग मजदूरों के दूसरे वर्ग अर्थात उत्पीडि़त वर्गों के विरुद्ध निहित अधिकारों का दावा करता है। कोई भी व्यक्ति भेदभाव पैदा नहीं करना चाहता। हमारा प्रयास इस भेदभाव को पहचानना और इस भेदभाव को हमारे प्रति अन्याय करने से रोक देना है।

इस बात का कोई सवाल नहीं है कि यदि आप अपनी शिकायतें दूर करना चाहते हैं तो आपको अवश्य ही संगठित होना चाहिए। अगला सवाल यह है कि आपके संगठन का क्या प्रयोजन है। इस संबंध में कोई शंका नहीं है कि आपको व्यापारिक प्रयोजनों के लिए संगठित होना है। सवाल यह है कि क्या आपको स्वयं अपना कोई अलग संघ बनाना चाहिए अथवा आपको किसी भी मौजूदा संघ के साथ जुड़ जाना चाहिए। इससे पहले कि आप अपनी कार्ययोजना के बारे में कोई निर्णय लें यह एक ऐसा सवाल है जिस पर आपको गंभीरता से विचार करना चाहिए।

भारत में ट्रेड यूनियनवाद एक खस्ता हालत में है। ट्रेड यूनियनों के मुख्य उद्देश्य की पूरी तरह अनदेखी की गई है। ट्रेड यूनियनवाद का मुख्य उद्देश्य है कामगार श्रेणी के जीवन स्तर को गिरने से बचाया जाए। यूरोप में एक सामान्य व्यक्ति में सुख सुविधाओं के सुस्थापित स्तर, जीवन की उस शैली से चिपके रहने की सुस्पष्ट प्रवृत्ति दिखाई देती है, जिसका वह अपने जन्म और प्रशिक्षण के कारण आदी हो गया है। इस तरह के स्तर में किसी भी गिरावट की दिशा में किसी भी प्रयास का वह पूरी दृढ़ता के साथ विरोध करेगा। यह एक अभिशाप है कि भारतीय कामगार में इस तरह का निश्चय नहीं दिखाई देता। वह केवल जीवित रहने की चिंता में पड़ा रहता है। उसके भीतर जीने की कोई इच्छा नहीं होती और जैसाकि मिल ने कहा है ‘‘जहां लोगों में इस तरह की गिरावट के विरुद्ध एक दृढ़ निश्चयात्मक विरोध नहीं है, सुख सुविधाओं के एक सुस्थापित स्तर को बनाए रखने का निश्चय नहीं है - वहां, यहां तक कि, प्रगतिशील देश में भी सबसे गरीब तबके के हालात इतने निचले स्तर तक गिर जाते है जिसे वह सहन करना स्वीकार कर लेते हैं’’। यदि कोई ऐसा देश है जहां ट्रेड यूनियनवाद एक वास्तविक जरूरत है तो मेरी राय में ऐसा देश भारत है। लेकिन जैसा मैंने कहा कि भारत में ट्रेड यूनियनवाद गतिहीन और बदबूदार तालाब बन गया है। यह सर्वथा इस कारण है कि ट्रेड यूनियनवाद के नेतागण या तो कायर हैं, स्वार्थी हैं अथवा भ्रमित हैं। कुछ ऐसे मजदूर नेता हैं जोकि आराम कुर्सी पर बैठने वाले दार्शनिक अथवा राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने अपना काम केवल कागजों पर वक्तव्य