44. 13.2.1938 ट्रेड यूनियनों को अपने हितों की रक्षा के लिए राजनीति में प्रवेश करना चाहिए। - Page 196

175

ने इस सबकी अनदेखी कर दी है और उन्होंने कामगारों के बीच असंतोष पैदा करने के लिए हड़तालों को एक दैवीय साधन मान लिया है। ऐसे साम्यवादी अधिक असंतोष पैदा कर सके हैं अथवा नहीं लेकिन उन्होंने निश्चय ही मूल ट्रेड यूनियन संगठनों जोकि उनकी शक्ति और ताकत का साधन होती थी, को नष्ट कर दिया है और अब वे वस्तुतः सड़कों पर आ गए हैं और सभी प्रकार के पूंजीवादी संगठनों का आश्रय ले रह हैं। इस तरह के बुद्धिहीन क्रियाकलाप से और किस बात की अपेक्षा की जा सकती थी। साम्यवादी इस तरह का आग लगाऊ व्यक्ति होता है जो एक व्यापक अग्निकांड उत्तेजित करने की अपनी इच्छा तो रखता है लेकिन स्वयं अपने मकान की रक्षा करने का कोई ध्यान नहीं रख पाता है।

फलतः अब ऐसी कोई यूनियन नहीं है जिनका कामगार आश्रय ले सकते हों। मैं उस रुग्णता की बात नहीं करने जा रहा जो बंबई के कपड़ा कामगारों के बीच बनी हुई है। इसके बारे में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा है। लेकिन जीआईपी रेलवे कामगारों में मौजूदा स्थिति पर विचार किया जा सकता है। 1920 में जीआईपी रेलवे स्टाफ यूनियन संगठित की गई थी। 1922-24 के वर्षों के दौरान यह यूनियन निष्क्रिय थी। 1925 में इसे पुनर्जीवित किया गया। 1927 में जीआईपी रेलवेमेन यूनियन के नाम से एक नई प्रतिद्वंदी यूनियन स्थापित की गई। 1931 में रेलवे कामगार यूनियन के नाम से दोनों यूनियनें एक-दूसरे के साथ मिला दी गईं। 1932 में यह यूनियन विखंडित हो गई और रेलवे लेबर यूनियन के नाम से एक नई यूनियन स्थापित की गई। 1935 में पुरानी जीआईपी स्टाफ यूनियन पुनर्जीवित की गई और उसने एक नए निकाय के रूप में काम करना शुरू कर दिया। आज की तारीख में यह एक मान्यताप्राप्त यूनियन है और उन यूनियनों के बीच एक गहरा विरोध और प्रतिद्वंदिता है जोकि रेलवे कामगारों के हितों के लिए खुलकर प्रयास करती हैं। यह सारा विरोध श्रमिक नेताओं के बीच साम्यवादी और गैर-साम्यवादी समूहों के मध्य नेतृत्व की प्रतिद्वंद्विता का परिणाम है। इसी प्रकार की प्रतिद्वंद्विता ने केन्द्रीय संगठन में बिखराव पैदा किया है। आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के नाम से श्रमिकों का एक केन्द्रीय संगठन 1919 में स्थापित किया गया था। सभी यूनियनों को 1929 तक इस कांग्रेस में शामिल कर दिया गया। 1929 में नागपुर में एक बिखराव आया और जिन यूनियनों ने साम्यवादी वर्ग का नेतृत्व स्वीकार नहीं किया था वे अलग हो गईं और उन्होंने नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन के नाम से एक अलग निकाय की स्थापना की। इन दो निकायों के बीच एक गहरे विरोध की स्थिति बनी हुई है। 1931 और 1932 में इन दो प्रतिद्वंदी निकायों के बीच एकता लाने की दिशा में कोशिश की गई, लेकिन ये कोशिशें असफल रहीं। इसी से मिलता-जुलता प्रयास अभी विचाराधीन है। इस सबसे कितना भला होगा, इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। ऐसी परिस्थितियों