44. 13.2.1938 ट्रेड यूनियनों को अपने हितों की रक्षा के लिए राजनीति में प्रवेश करना चाहिए। - Page 198

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यहां तक कि मानक दर, सामान्य दिवस, सामान्य नियम, न्यूनतम निर्वाह मजदूरी, सामूहिक सौदेबाजी जैसे सुधार प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए भी। ये ऐसे प्रयोजन हैं जोकि केवल यूनियन संगठित करने से प्राप्त नहीं किए जा सकते। कानून की शक्ति द्वारा यूनियनों की शक्ति का सुदृढ़ीकरण किया जाना जरूरी है। यह तब तक नहीं हो सकता जब तक कि आप केवल यही नहीं कि अपने आपको यूनियनों के रूप में संगठित करें, बल्कि देश की राजनीति में भी अपनी भूमिका का निर्वाह करने की शुरूआत करें।

शुद्ध रूप से ट्रेड यूनियन के हितों की रक्षा करना मात्र इस बात का कारण नहीं हो सकता कि ट्रेड यूनियनां को राजनीति में क्यों प्रवेश करना चाहिए। अपना ध्यान ट्रेड यूनियनवाद की ओर बांधे रखने का अर्थ यह है, कि आप तात्कालिक कार्य को अंतिम लक्ष्य मानने की गलती कर रहे हैं। यह मानकर चलना पड़ेगा कि दूसरों के लिए दासता एक भाग्य है जिससे कि श्रमिक वर्ग अपना बचाव नहीं कर सकते। इसके विपरीत आपका उद्देश्य मजदूरीजन्य दासता की इस प्रणाली की जगह एक ऐसी प्रणाली स्थापित करना होना चाहिए जो स्वतंत्रता, समानता और मित्रता के सिद्धांतों को स्वीकार करे। इसका आशय यह हुआ कि समाज का इस तरह का पुनर्निर्माण करना श्रमिक वर्ग की एक प्रमुख चिंता है। लेकिन श्रमिक वर्ग इस आदर्श की पूर्ति कैसे कर सकता है? राजनैतिक शक्ति का प्रभावी प्रयोग निश्चय ही इस उद्देश्य की पूर्ति का एक सशक्त साधन है। उन्हें ऐसी राजनैतिक शक्ति क्यों नहीं प्राप्त करनी चाहिए, जो उनके पास है। ट्रेड यूनियनों द्वारा राजनीति के परित्याग का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्तियों के रूप में कामगार राजनीति में रुचि नहीं लेंगे। इसके विपरीत उनमें से कई राजनैतिक बैठकों में भाग लेंगे, चुनाव के दौरान किसी एक अथवा अन्य उम्मीदवार को मत देंगे, जल्दी-जल्दी किसी एक अथवा दूसरे राजनैतिक दल का अंग बनेंगे। ट्रेड यूनियनों के लिए, ‘कोई राजनीति नहीं’ का अर्थ यह नहीं है कि कामगारों के लिए, जोकि यूनियन के सदस्य हैं ‘कोई राजनीति नहीं’ - यह आदर्श वाक्य केवल राजनीति के संगठित रूपों पर लागू होगा। ऐसी परिस्थिति में प्रत्येक अलग-अलग कामगार निजी रूप से राजनीति के साथ जितना चाहे उतना जुड़ सकता है। जिस तरह की राजनीति के साथ चाहे उसके साथ जुड़ सकता है, लेकिन जब वह अपने साथी कर्मचारियों के साथ संगठित होता है तो उसे संगठन में प्रवेश करते ही राजनीति का त्याग करना होता है। स्वभावतः राजनीतिक दृष्टि से अपने आपको इस तरह परिणत किए जाने के बाद, अपने वर्ग जोकि उसकी मूल शक्ति अर्थात संगठन का निर्माण करता है, के हितों के प्रयोग से इंकार करने से कामगार निश्चय ही पूंजीवादी दल की संगठित शक्ति का शिकार