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के बारे में सशंकित रहता हूं जो स्वतंत्र बनना चाहता है। यदि कोई राजनीतिज्ञ इतना स्वतंत्र है कि वह किसी के साथ भी नहीं जुड़ सकता, तो वह किसी भी व्यवहारिक प्रयोजन के लिए बेकार है। वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता। उसका अकेला हल घास का एक तिनका भी पैदा नहीं कर सकता। लेकिन अनेक ऐसे राजनीतिज्ञ, जो स्वतंत्र बनना चाहते हैं वे स्वतंत्रता की इच्छा इसलिए नहीं करते कि उनकी बौद्धि क निष्ठा इस तरह की मांग करती है। उन्हें स्वतंत्रता इसलिए चाहिए कि वे यह चाहते हैं कि वे सबसे बड़े बोली लगाने वाले के लिए उपलब्ध रहें। यही कारण है कि वे दल के अनुशासन की पाबंदियों से मुक्त रहना चाहते हैं। किसी भी स्थिति में राजनीति में स्वतंत्रता का मार्ग अपनाने वाले अनेक राजनीतिज्ञों के संबंध में मेरा अनुभव यही रहा है। दल के बिना कोई भी राजनीति वास्तविक एवं प्रभावी नहीं हो सकती।
प्रश्न यह उठता है कि आपको कौन से दल के साथ जुड़ना चाहिए? आपके सामने अनेक विकल्प रहते हैं। कांग्रेस पार्टी है। क्या आपको कांग्रेस के साथ जुड़ना चाहिए? क्या इससे श्रमिकों के हितों की पूर्ति में मदद मिलेगी? मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं होता कि राजनीति में श्रमिक वर्ग को कांग्रेस से स्वतंत्र एक अलग संगठन प्राप्त होना चाहिए। मैं जानता हूं कि मजदूर नेताओं का एक वर्ग इसका विरोधी है। कांग्रेस समाजवादियों के प्रतिनिधियों का एक दल है जो यह चाहता है कि श्रमिक वर्ग अपने आपको समाजवाद की पूर्ति के लिए संगठित हो, लेकिन इस तरह का संगठन अनिवार्यतः कांग्रेस के भीतर होना चाहिए। एक अन्य वर्ग है जो श्री राय के प्रतिनिधित्व में अपने आपको साम्यवादी कहता है और जो कांग्रेस के भीतर या बाहर भारत में श्रमिक वर्ग द्वारा या किसी अन्य वर्ग द्वारा किसी एक स्वतंत्र संगठन के विरुद्ध है। मैं इनमें से किसी भी समूह के साथ पूरी तरह से असहमत हूं। श्री राय मेरी तरह कई लोगों के लिए एक पहेली होंगे। एक साम्यवादी और श्रमिकों के लिए एक स्वतंत्र राजनैतिक संगठन के विरोधी। उनकी बातों में कितना विरोध है? एक ऐसा दृष्टिकोण जो कब्र में लेटे हुए लेनिन को भी हिला देगा। इस तरह के विचित्र दृष्टिकोण के लिए जो एकमात्र युक्तियुक्त औचित्य प्रस्तुत किया जा सकता है, उसके अनुसार श्री राय साम्राज्यवाद के विनाश को भारतीय राजनीति का प्रथम और अंतिम उद्देश्य मानते हैं। श्री राय द्वारा जिस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है उसका कोई भी अन्य अर्थ नहीं निकल सकता। यह दृष्टिकोण उस स्थिति में सही होता यदि यह प्रमाणित किया जा सकता कि साम्राज्यवाद की समाप्ति के साथ भारत से पूंजीवाद के सभी अवशेष लुप्त हो जाएंगे। लेकिन यह बात समझने में बहुत अधिक बुद्धि की जरूरत नहीं है कि यदि अंग्रेज लोग बाहर से चले जाते हैं तो