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‘‘यह स्वयंसेवक कोर दलित वर्गों द्वारा मानव अधिकारों के आग्रह के लिए शुरू किए गए संघर्ष के दौरान अस्तित्व में आई थी जिसकी चरम परिणति महाड सत्याग्रह के रूप में हुई।
‘‘इस कर्तव्य के समुचित निर्वाह के लिए आपको उत्तम चरित्र का व्यक्ति बनना होगा जिसकी तरफ बाकी समाज मानवता के आदर्शों के रूप में देखेगा।’’
‘‘आपको यह अवश्य याद रखना है कि आप भीड़ या जत्था नहीं हैं। आप एक बटालियन हों। और इन दोनों के बीच का अंतर एकदम स्पष्ट है। आपके जैसे मुट्ठी भर सुप्रशिक्षित और अनुशासनबद्ध व्यक्ति हजारों की भीड़ पर काबू पाने में समर्थ हैं। ‘आपके और एक साधारण भीड़ के बीच’ के अंतर का सार यही है।’’
‘‘डॉ. अम्बेडकर ने अन्य युवाओं से कोर में शामिल होने और इसकी क्षमता बढ़ाने की जोरदार अपील की और इसके साथ अपने वक्तव्य का समापन किया।
स्वयंसेवक कोर के जनरल आफिसर कमांडिंग की तरफ से श्री डी. वी. प्रधान ने यह आशा व्यक्त की कि वे भारत में अन्य प्रांतों में भी इसी तरीके से शाखाएं खोलेंगे जिस तरह से कि उन्होंने बंबई प्रांत के विभिन्न भागों में शाखाएं खोली हैं। ख्1,
1 बांबे क्रानिकल, 10 जनवरी, 1939