196 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और विदेशी मामलों तक नहीं जाता और यह कि प्रांतों में द्विशासन प्रणाली की तुलना में फेडरेशन में जिम्मेदारी की स्कीम, कम जिम्मेदारी पैदा करने के लिए तैयार की गई थी। डॉ. अम्बेडकर ने कहा ‘‘आप फेडरल स्कीम पर किसी भी दृष्टि से नजर डालें और उत्तरदायित्व से संबंधित प्रावधानों का किसी भी ढंग से विश्लेषण करें, आप यह देखेंगे कि वहां पर वास्तविक उत्तरदायित्व है ही नहीं।
‘फेडरल स्कीम के शाप’ का हवाला देते हुए डॉ. अम्बेडकर ने उसकी चर्चा की जिसे वे संविधान की सबसे बड़ी कमी मानते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसने यह नहीं देखा हो कि स्कीम में दोष ही दोष हैं।
आगे चलकर उन्होंने यह कहा ‘‘मतभेद तभी उत्पन्न होता है जब यह प्रश्न पूछा जाता है कि हम इस संबंध में क्या करेंगे। इस प्रश्न का उत्तर टाला जा सकता है लेकिन उससे बचा नहीं जा सकता। प्रश्न यह है कि हम किन पक्षों की बाबत संविधान को संशोधित करना चाहेंगे?’’ डॉ. अम्बेडकर ने अपने वक्तव्य में श्री सत्यमूर्ति द्वारा जारी किए गए इस आशय के वक्तव्य को शुरूआती बिंदु बनाया कि फेडरल संविधान में संसद को कौन से न्यूनतम परिवर्तन तत्काल करने चाहिए जिससे कि वे कांग्रेस के लिए स्वीकार्य हों। ‘‘डॉ. अम्बेडकर ने पूछा कि क्या ये परिवर्तन फेडरल स्कीम को नामंजूर करने के मौजूदा रवैये को उसकी स्वीकृति में बदलने के लिए काफी होंगे?
उनके विचार से फेडरल स्कीम को लेकर की गई आपत्तियां तनिक भी दूर नहीं की जाएंगी यहां तक कि यदि ब्रिटिश संसद श्री सत्यमूर्ति द्वारा की गई सभी मांगों को मंजूर करने को तत्पर हो। उनके अनुसार मूल प्रश्न यह था कि क्या फेडरल स्कीम इस तरह से विकसित होने में सक्षम है कि अंततः भारत अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा। इसी दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कहा कि स्कीम की जांच अवश्य की जानी चाहिए। डॉ. अम्बेडकर ने पूछा कि ‘‘भारत के राजनैतिक विकास का लक्ष्य क्या है?’’
डॉ. अम्बेडकर के अनुसार फेडरल संविधान के अधीन डोमीनियन दर्जा असंभव है क्योंकि संविधान स्थिर और कठोर है और यहां तक कि संसद के पास भी फेडरल स्कीम को पूरी तरह नष्ट किए बिना फेडरल संविधान में परिवर्तन करने का कोई अधिकार नहीं है।
इस तर्क का उल्लेख करते हुए कि संविधान ने स्वायत्त प्रांतों का सृजन किया था और इसलिए कुछ बाध्यकारी बल अवश्य प्रदान किया जाना चाहिए। वे