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इस बात से सहमत थे कि इस केन्द्रीय सरकार की स्थापना अनिवार्य है और यह कि उसके बिना स्वायत्तता निरंकुशता का रूप ले लेगी। लेकिन उन्होंने यह सोचा कि यदि वह संपूर्ण भारत के लिए केन्द्रीय सरकार की स्थापना का औचित्य सिद्ध करने का प्रयास करता है तो वह अपने सीमा क्षेत्र से आगे जाता है। उनके मतानुसार स्वायत्त प्रांतों के सृजन के लिए अखिल भारत के वास्ते केन्द्रीय सरकार के सृजन की जरूरत नहीं है, जरूरत केवल इस बात की है कि ब्रिटिश भारत के लिए केन्द्रीय सरकार का स्वरूप संघीय होगा। उन्होंने पूछा कि राज्यों को लाना क्यों जरूरी है? उन्होंने बताया कि भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने दो अलग-अलग फेडरेशनों की स्थापना की थी-अखिल भारतीय फेडरेशन के साथ ब्रिटिश भारत प्रांतों की फेडरेशन। उनकी विधायी तथा वित्तीय शक्तियों अथवा उनके अलग-अलग संगठन में कोई अंतर नहीं है। उनमें केवल एक बड़ा अंतर था।
जब केवल ब्रिटिश इंडिया फेडरेशन थी केन्द्र पर कोई जिम्मेदारी नहीं थी। अतः जब तक अखिल भारत फेडरेशन न हो केन्द्र पर कोई जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ कि राज्यों का प्रवेश ब्रिटिश इंडिया को उत्तरदायित्व प्रदान करने से पहले की एक शर्त थी। उन्होंने पूछा राज्यों का प्रवेश इतना जरूरी क्यों था? उनका उत्तर था ‘‘दो टूक तरीके से कहा जाए तो उद्देश्य यह है कि राजकुमारों का प्रयोग शाही हितों का समर्थन करने और ब्रिटिश भारत में लोकतंत्र की बढ़ती हुई लहर को दबाने के लिए किया जाए।’’ उनके सामने कोई और स्पष्टीकरण नहीं था। डॉ. अम्बेडकर ने कहा ‘‘फेडरेशन के प्रवेश के लिए कितना मूल्य चुकाया गया है?’’
केवल यही नहीं कि ब्रिटिश भारत केन्द्र में वह जिम्मेदारी प्राप्त नहीं कर सका है जोकि राजकुमारों के लिए फेडरेशन आसान बनाने के उद्देश्य से उनके द्व ारा किए गए त्याग के समतुल्य, हो बल्कि वह अपने अधिकार में और राजकुमारों से निरपेक्ष रूप से डोमीनियन दर्जे के लिए अपना दावा भी खो चुका है।
फेडरेशन के दो हिस्सों में से ब्रिटिश भारत प्रगतिशील भाग है जबकि राज्य अप्रगतिशील हिस्सा हैं। इसलिए प्रगतिशील भाग को अप्रगतिशील के रथ के साथ बांधा जाना चाहिए और मार्ग तथा नियति को अप्रगतिशील हिस्से पर निर्भर करना चाहिए, जोकि फेडरेशन का सबसे दुखद पक्ष है।
अंत में डॉ. अम्बेडकर ने फेडरेशन की बाबत विभिन्न दृष्टियों से विचार किया, राजकुमारों की दृष्टि से, हिंदुओं की दृष्टि से, और मुसलमानों की दृष्टि से। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार राजकुमारों के हित दोहरे थे। वे प्रभुता से बचना चाहते