52. 29.1.1939 भारत के राजनैतिक विकास का लक्ष्य क्या है? - Page 219

198 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

थे और वे अपने आपको फेडरेशन के प्राधिकार के अधीन अधिक नहीं लाना चाहते थे।

फेडरेशन पर दृष्टि डालते हुए राजकुमारों ने उनके सामने दो सवाल रखे... यह फेडरेशन किस प्रकार उन्हें प्रभुता के अत्याचार से बचा सकेगी और दूसरा यह कि यह स्कीम उन्हें आंतरिक सरकार की उनकी शक्तियों की प्रभुसत्ता को किस सीमा तक वंचित करेगी? डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘वे पहले प्रस्ताव में अधिक प्राप्त करना चाहते हैं और दूसरे के अधीन कम देना चाहते हैं।

इस संबंध में डॉ. अम्बडेकर ने आग्रहपूर्वक यह कहा कि उपर्युक्त के अलावा अन्य ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें अपनी बात अवश्य कहनी चाहिए। उन्होंने उल्लेख किया कि स्वतंत्र और गरीब व्यक्ति का दृष्टिकोण यह है। लगता है कि फेडरेशन ने उनका कोई ध्यान नहीं रखा, फिर भी ये ऐसे लोग हैं जो सबसे अधिक जुड़े हुए हैं।

डॉ. अम्बेडकर ने कहा ‘‘यदि यह फेडरेशन अस्तित्व में आती है तो स्वतंत्र व्यक्ति के लिए एक स्थायी संकट होगा और गरीब आदमी के लिए एक बाधा होगी।

अपने वक्तव्य का समापन करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा इस विषय की विशालता के कारण उनका वक्तव्य लंबा हो गया है। उन्हें यह भी कहा गया था कि वे वक्तव्य को छोटा न करें। और इस प्रसंग में उन्हें उन दिनों की याद दिलाई गई थी जबकि भारत के लोगों का नेतृत्व रानाडे, तिलक, आगरकर, गोखले, दादा भाई, फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी जैसे लोगों के हाथ में था। ये सब भारतीय राजनीतिक गगन में उल्लेखनीय व्यक्ति थे, अच्छी वेशभूषा में और सुविज्ञ राजनीतिज्ञों का यह एक ऐसा समूह था जो अध्ययन और अनुभव पर भरोसा करता था।

आज उनका स्थान जिन्होंने ग्रहण किया है........ आवाज आई।’’ ख्1,

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1 बांबे क्रानिकल, 31 जनवरी, 1939