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पर महार वतनदारों की नियति पूर्ववत थी और प्रायः प्रत्येक महार एक वतनदार है। अंग्रेजों ने उनका वंशानुगत पद को समाप्त नहीं किया। महार लोग पहले की तरह अपनी ड्यूटी निभाते रहे लेकिन ‘जूडी’ के नाम से उनका रियायती भू-राजस्व बढ़ा दिया गया।
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अनुचित कर
इस मामले की सरकार द्वारा जांच की गई और 1874 में पारित एक अधिनियम में यह कहा गया कि वतन भूमियां न तो हस्तांतरित की जा सकती हैं और न उन पर भार में तब तक कोई वृद्धि की जा सकती है, जब तक कि वैसा करना स्वयं महार वतनदारों क हित में न हों। इसके बावजूद कांग्रेस सरकार ने जो दलित वर्गों के हितों की पूर्ति करने का दावा करती है और जिसके पास राजस्व बढ़ाने के बहुत सारे मौजूद हैं, उसने अतिरिक्त राजस्व प्राप्त करने क लिए गरीबी में सबस अधिक जकड़े हुए इन वर्गों पर प्रहार किया है।
अध्यक्ष ने कहा कि एसा करना ‘‘केवल अनुचित और न्याय विरूद्ध ही नहीं है बलिक यह मौजूदा कानून का उल्लंघन है जो आज भी सविधि में मौजूद है यह गैर-कानूनी और असंवैधनिक भी है। और जब तक सरकार अपनी भूल महसूस नहीं करती और आदेश को रद्द नहीं करती महार वतनदार, अधिकारियों के विरूद्ध एक क्रांति की घोषणा करने और अपने ग्राम सुधारने कार्य करने से इंकार करने को विवश हो जाएंगे।
अध्यक्ष हड़बड़ी में किसी कार्रवाई क पक्ष में नहीं थे। वे चाहते थे कि मामले को सुधारने के लिए अधिकारियां को समय दिया जाए और सीधी कार्रवाई करने से पूर्व उन्होंने छः महीने का नोटिस देने का सुझाव रखा। उन्होंने कहा, ‘‘हम इस मामले में इतने गंभर क्यों हैं? यह इस कारण है कि कांग्रेस सरकार द्वारा अतिरिक्त भात डाले बिना भी महार वतन प्रणाली एक हृदयहीन शोषण है।’’
‘‘एक अन्य बहुत बड़ी समस्या है जो कि हजारां महारों के सामने पेश आ रही है। इस प्रांत में ऐसे असंख्य गांव है जहां महारों का यहां तक कि वतन भूमि अथवा किसी अन्य प्रकार के भुगतान के बिना उन्हें सौंपे गए सभी कार्य करने होते हैं। सच्चाई तो यह है कि यह बंधुआ तथा मुफ्त मजदूरी स कम नहीं है। इसका अंत किया जाना जरूरी है।’’