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श्रम साध्य प्रयासों के बिना हमारी सामाजिक स्थिति और भी
बदतर हो जाएगी
‘‘थाना में दलित वर्ग के छात्रों के छात्रावास की आर्थिक स्थिति पर विचार करने के लिए कल रात अर्थात 28 मार्च, 1941 को भट्ट हाई स्कूल हाल, बंबई में दलित वर्गों की एक सार्वजनिक बैठक आयोजित की गई। उसमें पंचायतों के अनेक विख्यात सदस्यों की उपस्थिति में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा शहर में महार समुदाय की पंचायतों के कामकाज पर कठोर प्रहार किया गया।
उन्होंने कहा कि ये पंचायतें, समुदाय पर सभी तरह के और विभिन्न आधारों पर चंदा वसूली कर रही हैं। इस तरह से प्राप्त अधिकांश पैसा पहले शराब के दौरों पर खर्च किया जाता था। लेकिन अब जबकि शहर में मद्यनिषेध लागू हो गया है, यह पैसा बताशे खाने और मिठाइयां बांटने पर खर्च किया जाता है।
डॉ. अम्बेडकर ने समुदाय के बड़े लोगों और वरिष्ठ सदस्यों से पूछा कि, आप लोगों को क्या हो गया है ‘‘जो बच्चों की तरह व्यवहार करने लगे हैं और जनता के पैसे से खरीदी गई मिठाइयां खाना चाहते हैं जबकि जीवन संघर्ष में समुदाय को अन्य समुदायों की तुलना में बढ़ती हुई प्रतिस्पर्द्धा का मुकाबला करना होता है। जब तक हम इन बचकाना क्रियाकलापों का त्याग नहीं करेंगे और सामाजिक तथा शैक्षिक उन्नति के लिए गंभीर काम नहीं करेंगे, हमारी स्थिति आज की तुलना में और भी बदतर हो सकती है।’’
डॉ. अम्बेडकर ने दलित वर्गों के सामने उन्नत भारतीय समुदायों को उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि उन्नत समुदायों का बीच सदैव कई लोग ऐसे होते हैं जो अपने समुदायों में अपने आपको पूर्णतः और जीवनपर्यंत शैक्षिक तथा अन्य सामाजिक संस्थानों के प्रति समर्पित रखते हैं और इसके लिए वे किसी पुरस्कार और यहां तक कि प्रशंसा प्राप्त करने की आशा भी नहीं रखते।
उन्होंने कहा कि दलित वर्गों के शिक्षित युवकों के बीच स्थानीय बोर्डों, नगरपालिकाओं में सीट प्राप्त करने अथवा मिलते-जुलते स्थान पाने की प्रवृत्ति रहती है और उन्हें यदि ये सब नहीं मिल पाते - और सभी को ऐसी सीटें मिलना संभव भी नहीं हो पाता, तब उस स्थिति में वे सार्वजनिक कार्य के प्रति अपनी सारी