217
66
वतनदारी : महारों के लिए एक अभिशाप
‘‘डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने सिन्नार, नासिक जिले में 16 अगस्त, 1941 को आयोजित एक बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें लगभग 4000 व्यक्तियों ने भाग लिया। डॉ. अंबेडकर ने कहा कि दिसंबर, 1939 में हुए हरेगांव सम्मेलन के एक निर्णय के अनुसार बंबई के महामहिम गवर्नर को एक अभ्यावेदन प्रस्तुत किया गया था, लेकिन उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि महारों और मांगों को अन्य वतनदारों के बराबर का व्यवहार प्राप्त नहीं हुआ था और उनकी वतन भूमियों पर जूडी कर बढ़ा दिया गया था। इसलिए उन्होंने महारों और मांगों को यह सलाह दी कि वे बढ़े हुए कर की वसूली का विरोध करें और किसी भी स्थिति में अपनी भूमियों का कब्जा न त्यागें। ख्1,
तथापि इस विषय पर डॉ. बी. आर. अम्बेडकर के वक्तव्य के अन्य आयाम भी थे जिन्हें बाम्बे क्रॉनिकल की रिपोर्ट में बताया गाया था। ये आयाम इस प्रकार थे। ‘‘महाराष्ट्र के महार, मांग तथा वेथिया वतनदारों को उनके अधिकार में पूरी शक्ति से वतन भूमियों पर लगाए गए अतिरिक्त भू-राजस्व की वसूली का विरोध करने के लिए दिए गए जोरदार वक्तव्य डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की अध्यक्षता में पिछली रात आयोजित की गई वतनदारों की विशाल बैठक में दिए गए।
कर की वसूली का विरोध करने का निर्णय उनके लिए एक तर्कपूर्ण परिणाम था।
अपने अध्यक्षीय भाषण के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने कहा ‘‘अपने समूचे सरकारी सार्वजनिक जीवन के दौरान, मैं भारत में सतत रूप से अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादार रहा हूं।’’
‘‘मैं अंग्रेजों के प्रति इसलिए वफादार रहा हूं क्योंकि सभी तरफ से शत्रुओं से घिरे हुए दलित वर्ग के लिए एक ही समय में सभी मोर्चों पर लड़ना संभव नहीं था। इसलिए मैंने सवर्ण हिंदुओं की 2000 वर्ष पुरानी यातना और उत्पीड़न के विरुद्ध और सबसे बढ़कर दलित वर्गों के लिए सामाजिक समानता प्राप्त करने के लिए लड़ने का निर्णय लिया।
- दि बांबे सीक्रेट एब्सेट्रेक्ट, 23 अगस्त, 1941