66. 16.8.1941 वतनदारी : महारों के लिए एक अभिशाप। - Page 240

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परिणाम कुछ भी हो हम देखेंगे कि सरकार ढीली पड़ेगी। हमें अपने निर्णय से वापस नहीं मुड़ना है, अपने निर्णय को कार्यरूप देने में तनिक भी लड़खड़ाना नहीं हैं।

अध्यक्षीय भाषण के बाद दो प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें से एक महार वतनदारी के प्रश्न पर डॉ. अम्बेडकर द्वारा राज्यपाल को भेजे गए ज्ञापन [*] के समर्थन में था और दूसरे में वतनदारों से अपनी ताकत के भीतर सभी साधनों से अतिरिक्त ‘जूडी’ की वसूली को रोकने के लिए कहा गया था। प्रस्तावों पर बोलने वाले लोग इस प्रकार थेः सर्वश्री आर. आर. भोले, बी. एच. वाराड़े, जे. एस. एंडले, पी. जे. रोहम, डी. जी. जाधव, बी. के. गायकवाड़ तथा ए. वी. चित्रे - ये सभी क्रमशः पूना, बेलगाम, शोलापुर, अहमदनगर, खानदेश, नासिक और कोलाबा जिले का प्रतिनिधित्व करने वाले बंबई विधानसभा के सदस्य थे।

इनमें से प्रत्येक ने अपने-अपने जिले के महारों के लिए किसी भी ऐसे आंदोलन के वास्ते जिसकी शुरूआत नासिक जिला कर सकता है और यदि अधिकारी समय रहते न माने तो अपने-अपने जिलों में सत्याग्रह शुरू करने की स्थिति में अधिकतम संभव सहयोग की पेशकश की।

अपने अंतिम वक्तव्य में डॉ. अंबेडकर ने आंदोलन शुरू करने के लिए वास्तविक तिथि को लेकर कुछेक पूर्व वक्ताओं द्वारा कही गई बात में सुधार किया।

‘‘डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘यदि कुर्की कल आ जाती है तो आपका विरोध कल शुरू होना चाहिए। इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं है, अनुदेश प्राप्त करने का कोई प्रश्न नहीं है।’’

‘‘जैसे ही इस कर की वसूली शुरू की जाए तभी नेइसका विरोध किया जाना चाहिए। इसलिए वतनदारों को अपने दिमाग में यह दृढ़ निश्चय लेकर लौटना चाहिए कि अतिरिक्त कर की वसूली का सबसे पहले कदम का और बाद में प्रत्येक कदम पर विरोध किया जाएगा। ख्1,

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* 1 दि बांबे क्रानिकल, 19 अगस्त, 1941देखें ज्ञापन पृष्ठ 308, 338 इस खंड का भाग 1 - संपादक