226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘मैं बहुत लंबे समय तक यह सोचता था कि हम हिंदू समाज को उसकी बुराइयों से मुक्त कर सकते हैं और समानता के आधार पर दलित वर्गों को उसमें शामिल कर सकते हैं। इसी उद्देश्य से महार चावदार टैंक सत्याग्रह तथा नासिक मंदिर प्रवेश सत्याग्रह प्रेरित हुए। इसी उद्देश्य को लेकर हमने मनु स्मृति जला दी और बड़े पैमाने पर जनेऊ संस्कार किए। पर अनुभव ने मुझे बढि़या सिखाया है। आज की तारीख में मैं इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हूं कि दलित वर्गों के लिए हिंदुओं के बीच समानता जैसी कोई बात नहीं हो सकती, क्योंकि हिंदुत्व की बुनियाद असमानता पर टिकी है।
‘‘हम अब हिंदू समाज का अंग बनने के इच्छुक नहीं हैं।
‘‘तो हमें क्या करना चाहिए? इस संबंध में हम उचित समय पर निर्णय लेंगे। इस घड़ी तो मैं केवल यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हम किसी भी स्थिति में हिंदू समाज का अंग नहीं बन सकते। हम इस देश को चलाने में सरकार के भागीदार बनना चाहते हैं। हम राजनैतिक अधिकारों का बंटवारा चाहते हैं। हमारे राजनैतिक अधिकारों को हिंदुओं से अलग सुस्पष्ट मान्यता मिलनी चाहिए।
‘‘यदि हिंदू लोग उन अधिकारों को मानने के लिए तैयार हों, तो देश की स्वतंत्रता के लिए साझा संघर्ष में मैं उनका साथ देने को तैयार हूं।’’
डॉ. अम्बेडकर वीरपूजक नहीं हैं और वे यह भी नहीं चाहते कि उनके अनुयायी ऐसा करें क्योंकि वे वीरपूजा की बुराइयों और देश के भीतर वीरपूजा ने जो तबाही पैदा की है उसको लेकर पूरी तरह सचेत हैं।
शांतिपूर्वक किंतु आग्रहपूर्ण शैली में डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा, ‘‘आप लगभग पिछले 15 वर्ष से मेरा जन्म दिन मनाते आए हैं। मैंने कभी उनमें भाग नहीं लिया। मैं सदैव उसका विरोधी रहा हूं। अब आपने मेरी स्वर्ण जयंती मनाई है; इसे ही काफी समझ लीजिए। अब आगे और कोई समारोह न मनाएं।
‘‘कारण, नेताओं के लिए अत्यधिक सम्मान लोगों के बीच आत्मविश्वास कम कर देता है, नेताविहीन होने, कठिन घड़ी में अथवा बेईमान नेताओं से घिरे होने पर वे लाचार हो जाते हैं।
‘‘डॉ. अम्बेडकर ने कहा, ‘‘हिंदू समाज की गिरावट और इसकी गिरी हुई स्थिति के बने रहने का एक बड़ा कारण कष्ष्ण का इस आशय का आदेश है कि जब कभी दुविधा पेश हो तो उन्हें अपने आपको निराशा की संशय दलदल से बचने के लिए उनके अवतार की तलाश करनी चाहिए। इसी बात ने कठिनाई के समय