1. 1.1.1927 महान संघर्ष। - Page 25

4 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शीघ्र ही, कोरेगांव लड़ाई का सामरिक महत्व समझ में आ गया। यह निर्णय लिया गया कि कोरेगांव के उस बिन्दु पर जहां पहला गोला दागा गया था, वहां पर लगभग 32 वर्गफीट का चबूतरा बनाया जाए और उस पर 65 फीट ऊंचा एक स्मृति स्तंभ खड़ा किया जाए ख्3, । इस स्तंभ की नींव का शिलान्यास 26 मार्च 1821 को हुआ था। यह स्तंभ सैनिकों के शौर्यपूर्ण वीरता के कार्य के स्मृति चिन्ह के रूप में किया गया था। बहादुर सैनिकों के कृत्य को चिर स्थायी बनाने के लिए यह निर्णय लिया गया था कि शहीद और घायल हुए सैनिकों के नाम स्तंभ पर खुदवा दिए जाऐंगे क्योंकि यह उन सैनिकों की वीरता, व कर्तव्य परायणता ही थी जिससे उस दिन फ़ौज की कीर्ति और गौरव बढ़ा। एक विशेष पदक भी 1851 में जारी किया गया जिस पर ‘‘भारतीय सेना को’’ व पदक के मुखड़ों पर ‘‘किरकी’’ व कोरेगांव भी छापे गए।

उसके बाद भी महार बम्बई सेना की कमुक व कार्यवाहियों में भाग लेकर संदेह से परे साहस और अडिग कर्तव्यनिष्ठ का परिचय देते रहे। उन्होंने लड़ाईयां लड़ते हुए काठियावाड़ (1826), मुलतान व गुजरात (1849) और कन्धार (1880) में वीरता, शौर्य व साहस का प्रदर्शन कर ख्याति प्राप्त की। बम्बई सेना ने अफ़गान युद्ध प्रथम व द्वितीय, मियानी की लड़ाई (1843), फ़ारस की लड़ाई (1856-57) ख्4, में भाग लिया। बम्बई सेना के सैनिक चीन (1860), अदन (1865) और अबीसिनीया (1867) में गए। मग्दाला के जनरल सर चार्ल्स नैपियर, जिनके नेतृत्व में बम्बई सेना लड़ी थी, कभी भी बम्बई देशी पैदल सेना की 25 वीं टुकड़ी का महत्वपूर्ण योगदान भुला न पाये, क्योंकि बम्बई सैनिकों की बदौलत उन्होंने सिंध पर विजय पाई थी। जनरल कहा करते थे, ‘‘मैं बम्बई सेना को सबसे अधिक प्रेम करता हूँ। मेरे जहन में जब-जब बम्बई सेना के सिपाही का विचार आता है मैं उनकी प्रशंसा किये बगैर नहीं रह पाता’’। बम्बई सेना के महार सिपाही नज़दीक भी व दूर सब जगह जाते थे और लड़ाई के मैदानों में अपने शौर्य की अमिट छाप छोड़ जाते थे।

द्वितीय अफ़गान युद्ध (1878-1895) में एक महार सैनिक ने एक बार फिर अपने अतिविशिष्ट वीरता, शूरता, निडरता, निर्भीकता के गुणों के प्रदर्शन से कोरेगांव में महार सैनिकों के कृत्य की याद ताजा करा दी। सिपाही सोननाक टननाक की उच्च श्रैणी की वीरता, साहस व शौर्य की गाथा मुम्बई में वॉडवी मार्ग पर लगे एक

4 भारतीय सेना का पहला ‘‘विक्टोरिया क्रास’’ फ़ारस की लड़ाई 20 वीं बम्बई स्थानीय पैदल सैना (120 वीं

राजपुताना राइफलस) का नेतष्त्व करते हुए कप्तान जे.ए.वुड ने जीता। सूबेदार-मेजर मोहम्मद शरीफ व

सिपाही भीर भट्ट (दोनों ही 20वीं बम्बई स्थानीय पैदल सेवा के नाम भी इस इनाम के लिए भेजे गए थे पर

नहीं दिये गए क्योंकि अक्तूबर 1911 से पहले यह इनाम भारतीय सैनिकों को नहीं दिया जाता था।