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शिलाखण्ड पर दर्ज है। पढि़ये, ‘‘इस मार्ग का नामकरण मेजर सिडनी जेम्स बॉडबी के नाम पर रखा गया जो कि इलाही बख्श व सोननाक टननाक (सभी 19वीं बम्बई पैदल सेना के) 16 अप्रैल, 1880 को अफ़गानिस्तान में डबराई चौकी का बचाव करते हुए शहीद हुए। उन्हें सूचित किया गया था कि दुश्मन कभी भी हमला कर सकता है इसलिए चौकी खाली करने में भलाई है। उन तीनों ने चौकी छोड़ने से इंकार कर दिया व लगातार तीन घंटें तक बड़ी वीरता से दुश्मन के लगभग 300 सैनिकों को जबरदस्त टक्कर दी और उनमें से बहुतों को मौत के घाट उतारा। अंततः जब उनकी बारूद खत्म हो गई तो वे दौड़कर लड़ते हुए दुश्मनों के बीच घुस गए और लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए’’। ख्1,
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने महार समुदाय का सन 1818 से पहले पेशवाओं के राज्यकाल में सामाजिक स्तर के बारे में वर्णन करते हुए कहा, ‘‘पेशवाओं के राज्य में मराठा गाँवों में जब कोई सवर्ण हिन्दू आम रास्ते जा रहा हो तो, किसी अछूत को उस रास्ते से आना जाना वर्जित था कि कहीं अछूत अपनी छाया से सवर्ण हिन्दू को अस्वच्छ न कर दे। अछूत को अपनी कलाई या अपने गले में काला धागा पहनना होता था ताकि अछूत की पहचान हो सके और सवर्ण हिन्दू गलती से भी अछूत को छू कर अस्वच्छ न हो।’’ पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूत को अपनी कमर में पीछे एक झाडू़ बांघकर जमीन पर लटका कर चलना होता था ताकि वह पीछे दूषित की हुई जमीन पर से धूल हटा कर साफ करता जाए जिससे कि पीछे आने वाला सवर्ण हिन्दू दूषित होने से बच सके। पूना में अछूत को अपनी गर्दन से एक मिट्टी का बर्तन (हंडिया) रस्सी बांध कर लटकाना होता था जिसमें वह अछूत थूकता था ताकि कोई सवर्ण हिन्दू अनजाने में भी जमीन पर पड़े थूक पर पैर डालकर
दूषित न हो।’’ ख्2,
- सदैव सबसे आगे - महार रैजिमैंट का इतिहास, लेखक वी. लोंगर पृष्ठ 12-15 2 लेख एवं भाषण खंड 1, पृष्ठ 39